Monday, May 16, 2011

अन्तिम शाम !

स्वागत किया था बौछारों ने
बौराई हवा भी तब संगदिल थी

चली जायेगी अपने देश प्रिये
तब बेगानों की बस इक महफ़िल थी

न जाने उनसे मिला मैं किस तरह
कोई विधान था या ये नियति थी

मनसा पुष्पों का संकलन किया
उन्हें विदा दूँ शायद यही रीती थी 


वक़्त थमा जब वो गुजरे
मैं बोलूं कुछ या देख लूं बस

ये आखिरी मिलन है सावन
ज़रा हौले - हौले तू थम के बरस

हमसे कुछ न कहा गया तब
बहारों ने भेजा उन्हें प्रेम मेरा

गिरे पुष्प उसके आनन पर
ये संजोग था निश्चल प्रेम का

अन्तिम शाम बनी है स्वर्णिम
वो निश्चलता अब भी है मन में

अधरों पर आ जाती गीतों में
पन्नो पर गध्य -काव्यों के सृजन में



6 comments:

  1. बहुत सुन्दर...

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  2. आपकी कविता में प्रेम का सकारात्मक स्वरुप देखकर अच्छा लगता है............बढ़िया

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  3. गिरे पुष्प उसके आनन पर
    ये एक संजोग था निश्चल प्रेम का
    bilkul

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  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

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  5. वक़्त थमा जब वो गुजरे
    उन्हें बोलूं कुछ या देख लूं बस

    ये आखिरी मिलन है सावन
    ज़रा हौले हौले तू थम के बरस
    काफी भावपूर्ण रचना है
    अच्छे लेखन के लिए बधाई

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...