Monday, May 16, 2011

थामने मन को तू मेरे



थामने मन को तू मेरे आधार बन आ जाती  है
रेत से झरते स्वप्न में, बहार बन आ जाती है  


मेरे मन की वीणा वीरानी ,तू तरंगो सी आ जाती है 
जब भी होता हूँ एकाकी  ,तू अधरों पर आ जाती है 

मेरे धुन कोयल सा  बोले ,तू ऋतुराज बन  आ जाती है 
मन को विचरण कराने ,तू परवाज़ बन आ जाती है 

मेरे शब्द  हैं  बंसी  जैसे ,तू स्वासों सी आ जाती है 
मधुर गीत फिर सुनने ,तू गोपियों सी आ जाती है 

मेरा तन थिरके न थिरके ,तू धड़कन बन आ जाती है 
जब भी डरता हूँ कल से ,तू बचपन बन आ जाती है 

मेरे शब्द हैं कोरे  हीरे ,तू रौशनी  बन आ जाती है 
लिख सकूं  रूहानी नगमे ,तू चाँदनी बन आ जाती है 

















2 comments:

  1. मेरे शब्द हैं कोरे हीरे ,तू रौशनी बन आ जाती है
    लिख सकूं रूहानी नगमे ,तू चाँदनी बन आ जाती है... bhut khubsurat panktiya.. har shabd jaise chun chun ke piroya hai apne... super...

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  2. मेरे शब्द हैं कोरे हीरे ,तू रौशनी बन आ जाती है
    लिख सकूं रूहानी नगमे ,तू चाँदनी बन आ जाती है

    रूहानी शब्द.

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