Tuesday, May 31, 2011

दृष्टि है दृष्टि का क्या



दृष्टि है दृष्टि का क्या 


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दृष्टि है दृष्टि का क्या 
वो बाह्य  आवरण परखती है   

हरियाली कब किसी पोखर की 
जीवों  का जीवन रचती हैं  

जलकुम्भी के झुरमुट जैसे 
फैले होते हैं मिथ्या ज्ञान  


सूर्य किरणों के अलौकिक सत्य से 
मन उपवन को वो ढक देती हैं 


दृष्टि हो बुध सी और ध्रुव सी 
तो जीवन में अमृत भरती है 

दृष्टि है दृष्टि का क्या 
वो बाह्य  आवरण परखती है   


  

एहसास



एक  तपतपाती   धुप   में  चलते   हुए  
कुछ  सुनाते  कुछ  सुनते  हुए 
चला  जाता  है  पूरा एक  दिन  
पर 

हर  बार  स्वेत  बूंदों  पर 
हाथ  फेरती  मद्धम  हवा  कहीं 
वृक्षों  के   स्पर्श  से  अमृतमय  होकर  एहसास  दिलाती 
है  कि    राह   में  अकेला  नहीं  है  कोई 

फिर  रेत  के  कण  जब  खेलने  लगते  हैं  आंख मिचौली 
तो  कहीं  से  एक  बौछार  आ  जाती   है 
बादलों  से  गुलाब  जल  लेकर  और  एहसास  होता 
है  कि  राह  में  अकेला  नहीं  कोई 

जब  शूल   चुभते    हैं  पाँव     में  
और   पास  के  किसी उपवन  में 
पड़े  गेंदे   के  पौधे   के  हरे  पत्ते  से 
उनके  रुधिर  को  ढकना  चाहता  हूँ  तो 
तुम्हारे  हाथों  की  मेहँदी  का 
स्मरण  हो  जाता  है  जब  पिछले  सावन  हम  और  तुम 
इसी  उपवन  में  भ्रमण  किया  करते  थे   
तुम्हारे  हाथों  का  लाल   रंग   जैसे   मेरे   हर  सुबह  की 
सूरज  जैसा लगता   था  ,


हमेशा  मुझे  संबल  देता  हुआ  
वैसे  ही  गेंदे  के  पत्ते  एहसास  दिलाते  हैं 
कि  राह  में  अकेला  नहीं  है  कोई  .....

वो पुराना रक्त वर्ण अश्व !



दूध  के  आखिरी  कटोरे  को 
अपने  सीने  में  छुपा  
वो  पुराना रक्त वर्ण  अश्व
 उस  बंजारे  को  ले  चला  है सुदूर ,

जहाँ   पिली  हुई   गेहूं   की  बालियों   के सदृश्य 
अश्व  ने  भी  अपना  रंग  चमकता  पिला  कर  लिया  है, 

बंजारे  का  वो  दूध   का   कटोरा   उसे   
याद  दिलाता   है  अपने  अकेलेपन  में  बतियाते 
कुछ  लिखते   गाते   अपने  चाँद  जैसे  दूध  के  टुकरे 
के  साथ  ...

पसीने  की  बूँदें  हैं  अब  उसकी  शिकन  पर 
और   थोडा   सुस्ता   लेता   है  वो  उतरकर 
आ  जाती  हैं  पत्ते  बन  कर  हवाए  उसे 
पंखा झूलने   ,

पर  अभी  बहुत  दूर  जाना  है  बंजारा  फिर  से 
सफ़र  पर  चलता  है  ....
उस विषम गुहा  में  प्रवेश करते ही  उस अनवरत दौड़ते अश्व में  रक्तवर्ण  का पुनः प्रवेश हो चूका है
और पतंग उड़ रहे हैं आकाश में ....,.
....,.

अपने पीछे छुपायें हुए बहुत सारे उजले बताशे 
और हलकी सी रौशनी के साथ एक चाँद का टुकरा ...
बंजारा ख़ुशी  से अपने वीराने जंगल के लिए अश्व से कूद पड़ा 
और 
उसके इस लम्बे सफ़र की दुहाई देते हुए सारे पतंग कट गए ...और बताशे 
गोरे- गोरे और सब के बीच दूध का कटोरा पूर्ण और सम्पूर्ण ,

आज बंजारा मन भर कर अपने मन को तृप्त करेगा ...........


इसी बीच रक्तवर्ण  अश्व  दूर उस नदी किनारे पेड़ के निचे  काले कम्बल की आकाश ओढ़ कर सुस्ता रहा है .....कल फिर कोई बंजारा जाएगा अपने गंतव्य पर....  

Saturday, May 28, 2011

ख्वाब बांटता है कोई!



साये के परदे हैं बस अब दामन में  
क्या नूर को भी  नकारता है कोई

जब से आया है वो  शहर में यारों 
लगता है ख्वाब बांटता है कोई 

न जाने क्या  है उसका  मोल साहब 
दीवानागी   क्यूँ  आंकता है कोई 

हसरते मिलने की महफ़िल से 
लम्हा लम्हा  हि  जागता है कोई 

हो न  हों पूरी ख्वाईशें दिल की 
खुद में खुद को ढालता है कोई 

हवाएं  शाख से खेलती रहती है 
कहता है दिल में झांकता है कोई

बेपरवाह है ज़माना उससे पर 

गुनाहगार खुद को मानता है कोई

मुफलिसी कब से दोस्त बन बैठी
उम्मीद फिर भी पालता है कोई

दिया जलाएगा वीराने में आकर
आज दिल से पुकारता है कोई 

वजूद

ढलकते  हैं  
कभी  उफनते  हैं 
खुद  से  लरते 
हम 
चलते  
रहते  हैं  ,

कभी पीपल
के आश्रय में
सब चिंता भूल जाते हैं
कभी हरे भरे
घास को लहलहाता  देख 
जीवन संघर्ष का
अर्थ जान लेते हैं,

बस ढूँढ़ते हैं खुद को 
और खो जाते हैं
अपने वजूद में 
एक नीम के शाख के जैसा
जो कड़वाहट से भी
मिठास घोलती है
क्या हुआ वो
कोयलिया की कूहू -कूहू 
से अछूती रहती है ,

अमराई  सा न हुआ तो
भी वे चलते रहते हैं 
दीवाने अपने रस से
सबको तृप्त कर देते हैं ...

Thursday, May 26, 2011

कांच के टुकरे

छोटे -छोटे
कांच के टुकड़े छोड़ कर
आया हूँ
रेत पर
लहरों से खेलते हुए ,

चमकते थे वो
जब
तब तुम्हारी
आँखों की खुशियाँ देख लेता था ,

एक बार फिर
उन्हें रेत से चुन
लाने को जाता हूँ ,

ढूँढने में
चोट तो लगेगी
पर
उन लहरों में खोयी मेरी
करुण पुकार
और
उस रौशनी
से चमकते वो
कांच के टुकरे ,

मेरे सभी दर्दों को
हर लेंगे
तुम्हारे उस
मूक परित्याग
का स्मरण करा कर मुझे ,

जब तुम्हारे उस परित्याग पर
मेरे मौन
स्वीकृति को
शायद तुमने
न समझा हो ....

ये बहते रुधिर आज
उस पल के साक्षी होंगे
जब ह्रदय पिघल कर
उस दिन बह गया था
तेरे लिए ....

शायद ये प्रेम भी कांच ही है !


     









चले आओ...

न छुपाओ खुद को यूँ रौशनी से ,चले आओ
खुद में ही न आज   उलझ जाओ ,चले आओ

महफ़िल तो  है बुलबुला सा ,खो जाता  है 
भीड़ में तुम भी न खो जाओ ,चले आओ

देखो है आज अँधेरा ,बहुत उस गुलशन में   
जो  खुद की आग में जल पाओ ,चले आओ

पाने का नाम मोहब्बत, कभी न होता है 
खुद को खो कर जो उसे पाओ ,चले आओ

माना की चाँद तुझसे ,बेवफाई करता है 
जो  पूनम रात को तुम चाहो ,चले आओ 

लहरें भी तो ,आती हैं चली जाती हैं 
तुम भी युहीं न ठहर जाओ ,चले आओ    

 

 

 




Tuesday, May 24, 2011

एक कतरा तेरे दिल का उसने छुपा रखा है..

एक कतरा तेरे दिल का  ...उसने छुपा रखा है
उम्मीद में तेरे आने की ...खुद को बचा रखा है

बेशक दूर हो तुम .........उसके गुलशन से 
तेरे लिए ही तो .......उसको  सजा रखा है

कोई पूछता ही नहीं ..हाले-ऐ-दिल उसका 
नाम जो दीवाना .....उसने  बता रखा है

कोई भी गुज़रे ......अब उन  गलियों से  
घर का दरवाजा... उसने खुला रखा है

आएगा कोई तो मुसाफिर,जो खुश हो जाएगा
खिलौना ख्वाबों का .........उसने बना रखा है 

फिर से न कोई ....आ जाए दिल की राहों में
उसने हर महफ़िल से ..खुद को जुदा रखा है

एक कतरा तेरे दिल का  उसने छुपा रखा है...
















































जाना है खुद को..तेरे जाने के बाद

Monday, May 23, 2011

खुद में सिमटा झील

इस शहर में भी ...


ग़ज़ल को शब्द दिए हैं :हरीश भट्ट सर ने


पर तू आ जाती है फिर भी क्यूँ ?

तुम्हारे  दिए  कुछ  ओस  की  बूँद  को 
समेट  कर  अपने  मन  के  कूप   में 
रखा  था  ,

तुम्हारे  
सान्तावना और अपनत्व   के बादल  आकर 
उस  कूप को भरने  की
कोशिश  करते  हैं  बरस  कर
कभी - कभी ,

पर  मैं  ही  उसे  तब ढक देता 
हूँ  
तुम्हे  दुःख   तो  होता   होगा  
पर तेरे   दिए वो   
ओस की बूँद
अमृत  हैं जिसे  मैं 
विलीन    नहीं  होने  दूंगा 
उन  बरसाती  बूंदों  के  साथ ,

तुम्हारा  प्रेम  इतना 
निर्बल  नहीं था की
मुझे  सहारे  की
आदत  पर जाए  प्रिये !

आखिरी  लम्हों में   शायद  तुमने 
उन ओस की बूंदों  को
संभाल  के रखने  के
लिए  कहा  था
अपने स्वाभिमान  की तरह ...

पर तू आ जाती है फिर भी क्यूँ ?

बहुत  कठिन  है पर
मैंने  संभाला  है प्रिये उन
ओस की बूंदों को ....

बादल बिन  बरसे  जाएँ 
अच्छा  लगता  है...
तुम्हारी  खबर  तो लग  ही जाती है....

ए मेरी कोयलिया

ए मेरी कोयलिया सुन 
क्यूँ मधुर गीत सुनाती है 

ग्रीष्म के अगन में क्यूँ सबको 
कान्हा की याद दिलाती है 

अमराई है तुझसे रौशन 
तू पंचम सुर जब लगाती है 

सुबह की किरणों के संग 
तू विनम्रता हमें सिखाती है 

मन उपवन को मीठे रस से
नितदिन तू  सींचती जाती है 

तुझसे बस कुछ कहना है 
तू हर दिन क्यों नहीं आती है 

ए मेरी कोयली सुन 
क्यूँ मधुर गीत तू गाती है 

Sunday, May 22, 2011

तू हमेशा पास ही रहती है..

हमारे मध्य 
जो मनमुटाव था 
वो रेत पर बने निशाँ थे 
पाँव के 
जो मिट गए 
हमारे प्रेम के लहरों में खो कर ...

हमारे बीच 
कभी संदेह  का आगमन हुआ ही नहीं
क्योंकि हम 
एक दूजे में 
दो पानी की बूँद  जैसे मिल गए थे
जिसे अलग नहीं किया जा सकता ..

आपसी समझ के ताप से वो 
वाष्प बनकर फिर से
ओस का निर्माण कर लेते थे 
किसी सूखे पत्ते को 
आस की बूँद देकर ....

हो सकता है हम बिछूड गए हों 
पर तेरे दिए उपहार आज भी 
मेरे छत  के ऊपर से
बादल बन कर जाया करती हैं 
और 
गलियों में खेलते बच्चे 
बरसात के इंतज़ार में 
खुश हो जाते हैं 
और उनके चेहरे पर रौनक और पैरों में फूर्ती आ जाती है ...

और फिर  मुझे तेरी याद आ जाती है
की तू ऐसे ही आया करती थी
और रोज़ शाम काम से घर लौटने पर
तू मुझे पानी के लिए
पुछा करती थी
और
अपने पल्लू से कभी कभी 
मेरे पसीने पोछ दिया करती थी ...

तू हमेशा पास ही रहती है..
                              



Saturday, May 21, 2011

दोहा

सहनशील  हो  अंगूर  सा   ,दाब  सहे  जो  यार
किशमिश  बन   मीठा  बने , बढ़  जाये  व्यापार 

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गुरु  घट  के  सामान  है ,महिमा  उनकी  अपार
जिसको  आश्रय  उन्होंने  दीया ,हुआ  शीतल  वो यार 

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जीवन  एक  पतंग  है  ,डोर  प्रभु  के  पास
उड़ते  जा  अनंत  में , ना  होना  कभी  निराश 



कहीं दूर चला जाता हूँ

ना ढूंढना अब , कहीं दूर चला जाता हूँ 
राहों को मोड़  कहीं दूर चला जाता हूँ 

तेरे दिए  बस वो पल हैं ज़ेहन में 
उनके सहारे कहीं दूर चला जाता हूँ 

तू याद रखना  उस जुदाई को बेशक 
मिलन को लिए कहीं दूर चला जाता हूँ 

तुने ही गम से उबारा था तब 
तेरे गम में ही अब कहीं दूर चला जाता हूँ 

कांटें मिलें या मिले मुझको पत्थर 
तेरे दर को छोर कहीं दूर चला जाता हूँ 

बदले न बदले इस ज़माने की रश्मे 
खुद को बदल कहीं दूर चला जाता हूँ 















Friday, May 20, 2011

वो पहली मुलाक़ात

अपने  अंतर के सभी निश्छल भावों को 
दबा लेना चाहता था उस दिन ,


अपने वीरान मन के एक कोने में 
जहाँ तुझे रोज़ देख सकूं 
तुझसे बातें कर सकूं ,


कुछ परिस्थितियाँ ऐसी थी जिसका
मैं भी खंडन करूँगा एकदम निष्पक्ष होकर
क्योंकि मैंने तुझसे नहीं 
तेरे भावना ,तेरे अंतर्मन ,तेरे स्वाभाव से प्रेम किया था ,


मैं शायद उन परिस्थितियों के उपरान्त 
हुए परिणाम  से अनिभिज्ञ था 
पर अब जब बहुत देर हो चुकी है 
और
 तुम्हारे मन में मेरे लिए एक 
आकृति, एक व्यक्तित्व का निर्माण हो चूका होगा ...
जिसकी कल्पना मैं नहीं करना चाहता 
पर काल बारम्बार स्मरण करा देता है ,

तब मैं विवश हो जाता हूँ 
और फिर पहली मुलाक़ात का स्मरण करने लगता हूँ 
जब न तुम हमें जानते थे न हम तुम्हे ,


ठीक पानी और उसमे मिलने वाली चीनी की तरह ....
जो अगर अच्छे से मिलती है तो मिठास उत्पन्न करती है ...
इसी प्रकार प्रेम भी है....तुम चीनी की जैसा आई थी ,
और बोली थी मेरा नाम लेकर ,ये मेरे संग है ...
लगा की मेरे मुख की बातों को तुमने अपना अधर दे दिया हो,

शायद प्रभु को ये ही मंज़ूर हो ..
और पहली मुलाक़ात पर प्रभु ने 
मेरी आत्मा की आवाज़ को सुन लिया हो ...
कहते हैं ..अगर किसी से प्रेम करो तो प्रभु आते हैं .....
ये तो प्रेम करने वाले जाने ...
क़ि  ये महज़ संयोग है या उस परमात्मा की विराट लीला ,


और वो पहली मुलाक़ात ही काफी है प्रिये ! मेरे लिए ,
चाहे तुम कितने भी दूर रहो
कितनी भी परिस्थितियाँ बदले ..
वो पहली निश्चल मुलाक़ात की विराटता को नहीं बदल सकती,
वो ही मेरी शक्तिपुंज है...
वो ही मेरी प्रेम की गंगा है...
और वो ही मेरा मोक्ष का सागर ,


इसे तुम मेरी नियति कह सकती हो...
पर मैं इसे उस प्रभु की कृपा मात्र मानता हूँ 
क़ि हमारी   वो पहली मुलाक़ात हुई 
जो जीवनदायनी  है ...इस अनारी के लिए,
कितना अपनापन था उस पहली मुलाक़ात में,


कितनी भी परिस्थितिया ,मनमुटाव या विरह ...
उसकी महानता को नहीं हर सकते हैं ,
वो आज भी शास्वत है...
एक अमर प्रेम के जैसा  ....
एक  अक्षय शक्तिपुंज इस अनारी के लिए....



"नीलांश"

Thursday, May 19, 2011

धुप-छाँव

धुप  एक  शाश्वत  रूप  है  
इस  कुदरत   की   शक्ति  का ,


जिस  समय   अँधेरा  हमें  उसको  याद  करने  पर  विवश  करता    है 
उस  समय    वो  कहीं  और  अपने  प्रेम  को  लुटा  रही  होती  है .....
ये  उसकी   विराटता   है,


धुप  और  छाँव साथ  चलते  हैं ,
बस   दो    बार  मिलते   हैं  अपने पूर्ण रूप में  ,
एक  बार    दुःख  के  समय  और  एक  बार   सुख   के   समय  ,


अथार्थ एक बार सूर्योदय के समय और एक बार सूर्यास्त के समय ,
यहाँ सूर्योदय के पहले की दशा को छाँव और बाद की दशा को धुप कहा गया है ...जो सूर्यास्त होने तक चलता है ,


नदी जो की हमेशा चलती रहती है इस जीवन की तरह ...सागर के तलाश में 
इस धुप में खिलती है 
और बादल को भेजती है छाँव   बनकर कभी -कभी जब धुप अपने ताप से जीवन को असंतुलित करती है ...
अतः छाँव  पूर्ण रूपें नष्ट नहीं होती ,

नदी जो हमेशा बहती रहती है ...
बादलों को छाँव  के रूप में भेज देती है ..
या फिर हम बोल सकते हैं  कि  धुप   अपने को सिमित कर छाँव का निर्माणकरती  है ....
बादलों को माध्यम बनाकर ,


हम   धुप और छाँव  अर्थार्थ यहाँ रात और दिन के 
विराट अवश्यम्भावी मिलन ,एक बार सूर्योदय के समय 
और 
एक बार सूर्यास्त के समय   को दुःख  समझे  या  सुख
ये हमारे अंतर्मन पर निर्भर करता है 
जहाँ  रोज़  सवेरा  ..अँधेरा  होते  रहता  है ,

और मन की नदी बहती रहती है ....
दुःख के ताप से वो आत्मशक्ति के बादल को प्रकट कर ..जीवन को संतुलित रखती है ...