Sunday, January 1, 2012

बेपनाह मुहब्बत

बेपनाह   मुहब्बत  में  कुछ  ऐसे  कसूर  हो  गए 
हर महफ़िल हर नज़र  से  हम  दूर  दूर   हो  गए 

और  कुछ  न  हो  मिला    इस  खामोश  सफ़र  में 
बेखुदी  के मीठे चोट से  हम बेबस  ज़रूर  हो  गए 

कातिल  बना  है  मुनसिब  और  पूछता  है  बार  बार 
कि  आप   किस  गुनाह  में  शामिल   हुज़ूर  हो  गए 

हमने  कहा   की  क्या सजा   है  दीद  -ए  -यार   की 
वो   मुस्कुराए   इस  तरह   की  दिल -ए -नूर  हो  गए 

फिरदौस  भी  मिल  जाए  गर  तो  क्या  करेंगे  हम  
हर  मोड़  पे  जब  रिश्ते  अपने  ना -मंज़ूर   हो  गए 

दिल  की  धड़कन   को  ज़रा उनको भी सुना देना हवा  
की  क्यों वो   अजनबी मेरे शाम  -ए -सुरूर   हो  गए 

ए  खुदा  ,तू  है  अगर  तो  इक  जवाब   बस  दे  मुझे    
कि  बेवज़ह   क्यूँ    ख्वाब   सारे   चूर   चूर  हो  गए 

फिर   भी  हमें  सुकून   है   वो  अदब   से  होंगे  वहाँ  
क्या  ये  कम  है  ,वो  हमारे  गम  के   गुरूर   हो  गए 



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