Saturday, March 31, 2012

तेरे लिए हरदम अपना दरवाजा खुला रखा है

हर किसी को कोई ना कोई बात का नशा है
ज़िन्दगी में आके कोई ज़िन्दगी से कहाँ बचा है

जब भी कोशिशों के संमुन्दर में डूब कर देखा
दूर फलक का चाँद बादलों में छुपा दिखा है

इस शहर में दिन ढलते ही मयकदे का शोर है
अब दीवानों को मुहब्बत का सजा मिलता है

रूठ कर गए हमसे ,ये बात बेमानी लगती है
अब भी जब ग़ज़ल में तुम्हारा नाम लिखा है

ख्वाब में आ जाओ गर ज़माने का डर है "नील"
तेरे लिए हरदम अपना दरवाजा खुला रखा है

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