Wednesday, April 4, 2012

शिरत न बदलना कभी

महफ़िल में जुदा हो के न रहना कभी
राज़-ए-दिल कभी युहीं, न कहना कभी

दरख्तों पर फल कभी ना लगे अगर 
उनके छाँव को न यूँ , भूलना कभी 

लहरें बस कहती हैं मांझी से, ये सुनो 
किनारे पे न बसेरा फिर ढूंढना कभी 

अखबारों से खबर लग जायेगी कल
बेगानों का यकीन ऐसे ,न करना कभी 

इन रंगीन पटाखों की बेवजह शोर में 
उन जवानो की खबर तुम  लेना कभी 

सुबह गुरबत्त से न मर जाओ सनम
इसलिए अँधेरे रात में, जगना कभी 

रास्ता बदले मगर मंजिल पाक ही रहे 
मिट जाना पर  शिरत न बदलना कभी 





1 comment:

  1. रास्ता बदले मगर मंजिल पाक ही रहे
    मिट जाना पर शिरत न बदलना कभी

    ....बहुत सुन्दर गज़ल...

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...