Wednesday, May 2, 2012

शायरी

ज़िन्दगी ऐसी ही है यहाँ  मिटटी का रंग नहीं बदलता 
सूरत बचाने में  इंसान अपनी शीरत भले बदल  दे 
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गुफ्तगू होती थी जब भी तेरी मैंने सुना था गौर से 
मालूम था  कि मेरे नसीब में तेरी मुहब्बत नहीं होगी 
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चाँद बेदाग़ नहीं पर फिर भी क्यूँ उसी कि बात है 
हम भले ना हो सके आपके ये ग़ज़ल तो साथ हैं 
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जब आये मायूसी तो मेरे तश्वीर से गुफ्तगू करना 
तुम  गम से नहीं अपने रूह से ही रू-बा -रू होना 
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जन्म तो फिर लेंगे दुनिया में ,पर मुहब्बत हो न हो 
दर्द-ए-दिल का ये शबब और तेरी ज़ीनत हो न हो 
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खुशबू बाँटते बाँटते बागवान  की अब  शाम हो गयी 
पर उसे गम है कि सुबह गुलशन को पानी कौन देगा 
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डालियों पे  लगे पत्ते सूरज को निगलते हैं 
तभी तो रोज़ हम घर से ख़ुशी में निकलते हैं 
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जलते जलते जल गया पर वो नहीं आये 
इक ख़त भी आया तो ज़माने ने जला दिया 
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तुम्हारे पास हमें भूलने के बहुत तरीके हैं 
पर हम आज भी तुम्हारे ही गम में जीते हैं 
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पथराई आँखों में प्यार है किसका 
सब चीज हार ,इंतज़ार है किसका 
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चेहरे पढ़कर थक गए ,हर मोड़ पे सनम 
रूह को जाना होता तो राहें मिल जानी थी 
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रंग भरे जो जीवन में वो सपने जाने कहाँ गए ,
वो महफ़िल ,बचपन ,अल्हड़पन ,सब अपने जाने कहाँ गए ...

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