Wednesday, May 2, 2012

खुदा

 
जब कभी कोई दुआ तेरी पायी तो ,बस खुदा देखा
जब कभी घर की चिट्ठी आई तो , बस खुदा देखा

बस ख्वाब ही थे रूबरू तेरा दर्श कहाँ था
जो ख़्वाबों में तू समाई तो ,बस खुदा देखा

सुर थे मगर घटाएं ,बिजली ,पंछी के सिवा क्या ?
बजी तेरी प्रीत की शहनाई तो बस खुदा देखा

कई पन्ने पलटे मगर फिर भी रहे बेचैन
पढ़ी "हरिवंश " की रुबाई तो बस खुदा देखा

कभी फाकाकशी तो कभी दो कोर मिले परदेश में
माँ ने अपने हाथ से खिलाई तो बस खुदा देखा ..

7 comments:

  1. आपकी पोस्ट 3/5/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 868:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  2. खूब---तेरी गज़ल नज़र आई तो खुदा देखा

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  3. वाह ...बहुत खूब।

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  4. dilbaag ji,sangeeta ji,verma ji,maheshvari ji,sada ji,shyam ji aapke sneh ke liye bahut aabhaari hoon

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