Saturday, June 9, 2012

गुनाहगार खुद को अब भी मानता है कोई


हर वक़्त क्यूँ रिश्तों से भागता है कोई 
क्यूँ तश्वीर दीवारों पर टाँगता है कोई 

इस जहाँ में हर मोड़ पे होते हैं तजुर्बे 
कहीं मिले सब कुछ दाना फाँकता है कोई 

साये के परदे  हि रह गए   हैं दामन में 
क्या नूर को भी नकारता है कोई

जब से आया है वो शहर में यारों 
लगता है कि ख्वाब अब बांटता है कोई 

न जाने क्या है उसका मोल ए साहब 
दीवानागी को क्यूँ आंकता है कोई 

हसरते मिलने की महफ़िल से रात भर 
लम्हा लम्हा हर घड़ी जागता है कोई 

हो न हों पूरी सुहानी ख्वाईशें दिल की 
बेशक खुद में खुद को ढालता है कोई 

हवाएं शाख को सहला कर चली गयीं 
कहता है हँस के दिल में झांकता है कोई 

ग़ाफिल है ज़माना इक अरसा गुज़र गया 
गुनाहगार खुद को अब भी मानता है कोई 

मुफलिसी न जाने कब से दोस्त बन बैठी 
उम्मीद आँखों में फिर भी पालता है कोई 

दिया जलाएगा नील आँखों के वीराने में 
आज जान-ओ-दिल से पुकारता है कोई 

2 comments:

  1. हर वक़्त क्यूँ रिश्तों से भागता है कोई
    क्यूँ तश्वीर दीवारों पर टाँगता है कोई....khubsurat gazal....

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