Saturday, September 22, 2012

nazm ki mukarrar koi bhasha kyun karen


mil gaya firdaus to tamaasha kyun karen,
shekh ham bandagi zara sa kyun karen

nazm ki mukarrar koi bhasha kyun karen,
yahaan kaaba yahaan kailaasha kyun karen,

ban na jaaye kahin kaaghaz sehra,
bin syaahi kalam ko pyaasa kyun karen

kahin deewaar na ban jaaye parda,
badi maasomiyat me khulaasa kyun karen

aah se bhi nikle ghazal to duaa ban ke,
kya bisaat ,mohre, paasa kyun karen

ye na poocho neel pardesh jaakar,
ki ham beeti baat ko taaza kyun karen

Sunday, September 9, 2012

ठुकरायें या कि अब पसंद कीजे



किस तरह से खुदी को अर्जमंद कीजे 
वक़्त के वास्ते उसे कैसे  पाबन्द कीजे 

सोचता  है   ये  मन  कितना  ज्यादा ,

आईये  पूछ  कर  कोई  बात  खेल  बंद  कीजे ,

आपका  है  ख्याल -ओ -ख्वाब  आपकी  सीरत ,
ठुकरायें  या  कि  अब  पसंद  कीजे 

इस तरह गिरियाँ न गिराओ यारा ,
फ़िराक आये कभी तो जी बुलंद कीजे 

हो  वफाओं पे अना का क्यूँ जोर-ओ -सितम 
जान को ज़रा सा अपने होशमंद कीजे 

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फिराक : जुदाई 
गिरियाँ :अश्क ,आंसू 
अना : ग़ुरूर 
सीरत - चरित्र 

इंकलाबी जोश को महज़ घुड दौड़ समझा

हमने  लिखा ,सबने पढ़ा,कुछ और समझा
इंकलाबी जोश को महज़ घुड दौड़ समझा

हम दीवानेपन में तो बदनाम हो गए मगर 
पीनेवाले को ही सबने  क्यूँ सिरमौर समझा 

जब हम मिले तो ये इतेफाक थी,जब बिछुड़े 
तब  हमें क्यूँ  उन्होंने काबिल-ए-गौर समझा 

उनके मुहब्बत में हमने हसीं ग़ज़ल लिखे 
क्या रसद ,हमने तो अश्कों को कौर समझा 

यहाँ सब खुश क्यों हैं चम्बल की आज़ादी से
क्यूँ नहीं किसीने चम्बल को चितौड़ समझा 




Saturday, September 1, 2012

शिरत से ही पहचान है

सूरत  से  नहीं  शिरत  से  ही  पहचान  है 
चाँद  बेदाग़  नहीं  फिर  क्यूँ  तू  अनजान  है 

क्या  ला  सकोगे  चांदनी  लाखों  दिए  जलाकर  भी 

लगता है ,सपने नहीं देखता

चिड़ियों के पंखों  को समेटता रहता है वो नादाँ 
कहता है आसमान में उड़ना है 

लगता है ,सपने नहीं देखता !