Sunday, October 21, 2012

यकीन

वो कहते हैं कि मैं लिखता हूँ बेहतरीन आज
नहीं होता है खुद पे ही मुझको यकीन आज 

यही कहता है शाम-ऐ-शहर का मुझे आलम
कि बनता जा रहा हर शख्स एक मशीन आज 

कहते हो तो गाँव हैं , या कह दो तो शहर का शोर
उसे गेहूँ उगानी है ,वो बस चाहे ज़मीन आज

ज्यूँ धागे को किसी सुई में पिरोता है करीने से
उसी से सिख लेता हूँ की क्या है महीन आज

वही जिसने थमाया था कलम काग़ज़ का इक तोहफा
उसी के नाम करता हूँ कोई नगमा हसीन आज

सागर


आ जाओ सफीनो एक बार ,फिर खुद को तैयार करो 
साथ नहीं है कुछ भी तो फिर हिम्मत को पतवार करो 

दरिया की लहरों पे तुमने ढेरों दाँव लगाये हैं
आज मिला है मौका तो सागर से भी दो चार करो 




बद-शरियत न रोक पायेगी इन कदमों को बढ़ने से
आओ क़ाज़ी ,शेख ,अलामा हमको भी गिरफ्तार करो

वो चाँद हुआ है रोशन और कहता है चकोर से,
कर सकते हो यारा तो फिर मावस में भी प्यार करो

एक उसूल ही है अपना ,मिट जायेंगे भले मगर,
जंग में दुश्मन पर कभी भी पीछे से न वार करो

हम तो काग़ज़ के टुकड़े और कलम ,स्याही रखेंगे
शेख तुम भी भाले ,बरछी ,और ना ही तलवार करो

हम जो साथ रहें तो यारा न कोई दीवार करो ,
हम जो होंगे साथ नहीं ,इन ग़ज़लों पे ऐतबार करो

हो परदेशी ,नील शहर में ,कुछ देर तलक ही आये हो,
लेकिन जाने की बातें ना यारों से हर बार करो

Sunday, October 14, 2012

हम काग़ज़ कलम स्याही के हिसाब कहाँ से देखें


हम काग़ज़ कलम स्याही के  हिसाब कहाँ से  देखें
इस दौर में मेरे रब्बा अब किताब कहाँ से देखें 

हम जब बोलें कि नदिया ,खेत तालाब कहाँ से देखें 
ऊपर वाले कहें ऐसी , इन्कलाब  कहाँ से देखें 

जब परदे  के  पीछे है काँटों की  खैर-ओ-खिदमत
तो भला भरम वाले हम  ,गुलाब कहाँ से देखें 

होती है हर दिन अपनी आसमान से बातें
बादल छंटते ही नहीं फिर, आफताब कहाँ से देखें 

होता जब बीज का सौदा अब शहर-शहर मेरे यारा ,
होगा फिर फसल-ए -बहारा ये ख्वाब कहाँ से देखें 

माफ़ करो अजीजों कि बंदिश ने हमें जकड़ा ,
अब मिलने वाले सारे   आदाब कहाँ से देखें  

बस छोटा सा सपना है और छोटा सा है दिल,
बोलो ए साहिब फिर इतने अज़ाब कहाँ से देखें 

पूछो तो तिनके तिनके ही से बन जाए नशेमन,
सोचो तो नील इसे भी हम पायाब कहाँ से देखें 

खड़ा होता है कैसे घर बनकर


रहती है रेत की चादर बन कर,
आयी है ज़िन्दगी लहर बन कर 

किसी पन्ने की एक उमर बन कर
आई है रोशनाई हुनर बन कर 

कैसा है मशगला उन साँसों का ,
बाँटते है गीत नामाबर बनकर 

जाता है ख्वाब का दिया दे कर,
आता है नूर-ऐ-नज़र बन कर 

किसी को भाये हिमालय की हस्ती ,
कोई रहे मील का पत्थर बन कर 

किसी को मंजिलों की ख्वाईश है ,
कोई है मशगूल रहबर बन कर !

ईंट ईंट कैसे जुड़ जाते हैं "नील" ,
खड़ा होता है कैसे घर बनकर 

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नामाबर :messanger
मशगूल : busy
रहबर:guide

चाहिये दोस्तों अब कितना जवाब


चाहिये दोस्तों अब कितना जवाब ,
साँस लेने का होता नहीं है हिसाब !

देख कर आपकी नज़र की दुआ ,
भूल जायें जहाँ भर के हम गुलाब 

जाग कर ख्वाब का सामना कीजिये,
नींद की ज्यादती हो न जाये खराब

आईये कि ये शहर पुकारा करे ,
होंगे अपने गली के भले ही नवाब 

सुन साकी कि हमको दो हर्फ़ बहुत, 
क्या पैमाना ख़ास ,क्या महंगी शराब 

हर घड़ी छोड़ देता है वाजिब सवाल,
ए खुदा! तू भी कितना है लाजवाब 

दीजिये नील स्याही काग़ज़ कलम
लीजिये बावफा लिख दिया इक़ किताब 

बावफा : loyal

aaina-e-kaaghaz uthaaiye


sabj hogi ye dharti fir se kabhi,baadalon ka bharosha nahi kijiye
aayiye aake kyaari laga dijiye,hakumaton ko bhi kosa nahi kijiye

do niwaale bacha ke kahaan kho gaye,bacche bin khaaye so gaye
bhul jaayen ranjish bad-rasm-o-riwaaj,ghaflat ka roza nahi kijiye

aapke haath ka ye likha khat bahut,aasmaa.n hai nahi,magar chat bahut
dhund lijey kinhi harfon me hame ,chaand taaron me khoja nahi kijiye

aaino ke mukhaatib nahi jaaiye ,aaina-e-kaaghaz uthaaiye,
lijiye ye kalam ka tohfa ,apni syaahi se dhokha nahi kijiye

main juda tu juda ,aye khuda o khuda ,hain kahaa.n raasta,
hona hoga jo hoga ho jaayega,hausla hai, socha nahi kijiye

***
sabj:green
roza:fasting
ghaflat :negligience

Saturday, October 13, 2012

बस कलम तेरा


मेरे वास्ते बचा क्या था बस कलम तेरा ,
काग़ज़ में छुपा के रखूँ अब मरहम तेरा 

रोज़ बस एक ही सवाल करती है कलम ,
की मेरी स्याही पे निशार हो कदम तेरा 

धुल में लिपटे हुए पन्ने को उठा कर लिख दे ,
देर तक संभालेंगे किताबों में परचम तेरा 

मेरे हर्फ़ यहाँ साज बन गए और राह तकें
बेजुबां हो न जाएँ ,ढूंढते हैं सरगम तेरा

यूँ तो हर चीज़ की है कीमत ,मगर सोच लूं
कि मेरी नज़्म क्या दे पाऊंगा मैं रकम तेरा

पतझड़ ,सावन ,बहार ,जेठ बदल जाते हैं,
मगर बदलता नहीं है याद का मौसम तेरा

तू कोई चाँदनी नहीं जो कम हो जाए पल में ,
मुझको मंज़ूर नहीं चमकना कम तेरा

वही सागर ,वही साहिल ,वही लहरों की सड़क ,
चल रहा है सफ़र पे जहाज़ मद्धम तेरा

जिस तरह सहर की रुत में हर दिन ओस खिले
उस तरह ही लगे हर घड़ी शबनम तेरा

ये ग़ज़ल भी दे देगी शेख दो बूँद भर जां,
भूल आयें हैं इसी खातिर दैर -ओ -हरम तेरा

वो उभर आता ही है तश्विरों में अब देख लें ,
नील स्याही में जो भर लेता हूँ ग़म तेरा

Saturday, October 6, 2012

कर रहा है उसी से अब दिलजोई भी

सिखा है उसी से हमने ग़ज़लगोई भी ,
बड़ी काम की है उसकी साफगोई भी 

फिर कोई पल हमने संजोई भी ,
फिर से कलम स्याही में डुबोई भी 


ग़ालिब तेरे अशरार में क्या बात है ,
जो देर तक खो जाये उनमे कोई भी

आज फिर बादल आ कर के गए ,
आज फिर इक बीज हमने बोई भी

आ गया बूढ़ा ,वही प्याला दिखा
खुल गयी है उसकी अब रसोई भी

देखो हिना से तश्वीर कैसी खिल गयी
कर रहा है उसी से अब दिलजोई भी

बोलता है पन्ना पन्ना किताब का,
नील आँखें जागती हैं कि सोई भी 


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साफगोई :स्पष्टवादिता
ग़ज़लगोई :ग़ज़ल कहने की प्रक्रिया
अशरार :शेर का बहुवचन
दिलजोई: दिलासा देना ,तसल्ली देना ,सान्तवना

Monday, October 1, 2012

तूफ़ान


तिनके  तिनके  बिखरे  गए  रात  तूफ़ान   में 
जो  उसने  बिने  थे  उस  आँगन  से ... 


सहमी  गौरैया  देख  रही  है  उन्हें  जलवान  बनते  ....