Friday, November 2, 2012

रास्ता बदल गया

मंजिल अब भी वहीँ है मगर रास्ता बदल गया 
देखो तूफ़ान आने  पे  कश्ती  कैसे संभल  गया 

तुम उनसे चिन्गाड़ी के  मायने न पूछना कभी
जिनका मकान दंगो की लपट में कल जल गया 

इतना आग न लगाया करना  बीहरों में कभी 
बर्फ का चादर वहां पर्वतों पे देखो पिघल गया

किससे  रखें उम्मीद  अब,किसपे करें  यकीन  
जो  साथ था कल वही जब  आज हमें  छल गया 

पिछले बरस बारिश में क्यूँ  तालाब न बनाया था 
अब हाथ मल रहे हो जब बिन बरसे वो बादल गया 



3 comments:

  1. मंजिल अब भी वहीँ है मगर रास्ता बदल गया
    देखो तूफ़ान आने पे कश्ती कैसे संभल गया..bhaut khubsurat panktiya....

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  2. सुषमा जी आपका बहुत धन्यवाद
    आभार अमृता जी

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