Tuesday, November 20, 2012

चरागें मयस्सर करने चला था

चरागें मयस्सर करने चला था 
कोई ज़ख्म गहरा भरने चला था 

वो खुद ही खुद संभलने चला था 
सूरज सा वो भी जलने चला था

कुछ यादों की इक राह पर 
वो दूर तक टहलने चला था 

काग़ज़ पर लिख के कोई ग़ज़ल 

वो ज़िन्दगी को पढने चला था

आदत थी कुछ कुछ मेरी तरह
वो मुझको बदलने चला था

खुली आँख से देखा था ख्वाब
और एक हकीकत गढ़ने चला था

कुछ शायराना माहौल था
वो राज़-ए-दिल कहने चला था

थामे कलम की रौशनी
वो वादियों में बिखरने चला था

जो हो जुदा ,सबसे अलग
कुछ ऐसा अब करने चला था

आँखों में था जलता मशाल
और तीरगी से लड़ने चला था

जाने थी कैसी दीवानगी
फिर से मुहब्बत करने चला था

लिख कर नील स्याही से नज़्म
पढ़ कर उन्हें हि ,बहलने चला था

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