Friday, November 23, 2012

काश की इस दश्त में ऐसा रिवाज़ हो


ग़ालिब-ओ- मीर हो या फैज़-ओ-फ़राज़ हो 
हर जगह शायरी का तख़्त-ओ-ताज हो 

जब दवा हो जाए नाकाम दोस्तों 
तब ग़ज़ल से ही गम का इलाज़ हो 

हो कलम हाथों में और मिटे खंजर 
काश की इस दश्त में ऐसा रिवाज़ हो !

आज लम्हों को जियो दिलनवाज़ी से 
क्या पता कल वक़्त का कैसा मिज़ाज हो 

अब कोई तर्क-ए-वफ़ा, न करें साहब 
न कोई भी पर्दा हो ,न कोई राज़ हो 

ये आरज़ू थी कि जो कब से नहीं आया 
वो मुखातिब मेरे महफ़िल में आज हो 

वो कहाँ मांगे है सुर साज पूरी ज़िन्दगी 
लेकिन उसके लिए, भी कभी आवाज़ हो 

ए खुदा ,मेरे खुदा ! अब मांगता हूँ ये दुआ 
कि ज़माने से अलग नील का अंदाज़ हो

5 comments:

  1. जब दवा हो जाए नाकाम दोस्तों
    तब ग़ज़ल से ही गम का इलाज़ हो
    kya baat hai dost,aap ki jagal pad kr maza aa gay

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  2. aapka bahut aabhaar sikha ji
    bahut dhanyavaad alok bhai
    bahut aabhaar sushma ji

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...