Monday, December 3, 2012

वो कौन ऊपर बैठ कर मौसम बनाता है



बेचैन  साँसों को  कोई  सरगम बनाता है 
मेरे तन्हाई को ही मेरा हमदम बनाता है 

किसका होना उसे  मुसल्लम बनाता है  
किसका नहीं होना उसे बेदम बनाता है  

है  वही चारागर गुरबत्त  के मारो का 
जो दर्द को पी कर  मरहम बनाता है 

इंसान   को ही झेलने परते हैं हर लम्हे 
वो कौन ऊपर बैठ कर मौसम बनाता है 

दुश्मनी, रंजिश, जंग का सबब खंजर 
इंसान को इंसान तो कलम बनाता है 

खाख में मिट जाती है हर चीज़ दोस्तों 
ये  अना  इंसान को अदम  बनाता है 

वाजिब जवाब कोई  मिलता नहीं मगर 
कौन पहेलियों मे पेच-ओ-ख़म बनाता है 
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मुसल्लम :complete 
अना :ego 
अदम :nothing 
पेच-ओ-ख़म:complexity 

6 comments:

  1. बेचैन साँसों को कोई सरगम बनाता है
    मेरे तन्हाई को ही मेरा हमदम बनाता है....खुबसूरत अभिवयक्ति.....

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  2. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति ..नीलांश जी ..

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  3. खुबसुरत अभिव्यक्ति. बेहतरीन गज़ल.

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  4. सुषमा जी ,शारदा जी ,निहार जी
    आपके प्रोत्साहन का बहुत आभारी हूँ
    सादर धन्यवाद

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...