Sunday, December 16, 2012

फिर रहे हो किस किस दयार में


जीत में खुशखबर और ग़म हार में 
ज़िन्दगी यूँ ही कटती है बाज़ार में 

कुछ तो था ही असर उनके गुफ्तार में 
देर तक जो रहा कूचा -ए -यार में 

जिनके आने की उम्मीद भी न रही 
उसको क्यों ढूंढते हो अखबार में 

हम को भी है ,तेरे फन पे, ऐतबार 
तुम भी हँसते रहो अपने किरदार में 

वो अदा ,वो सदा और वो बाकपन 
दब गयी होंगी माजी के दीवार में 

एक ख़त ही तो है और कुछ भी नहीं 
पर ख़ुशी छा गयी देखो घर बार में 

आ के साहिल पे मांझी नहीं सोचता 
कितनी आई खरोंचें पतवार में 

क़त्ल होता नहीं शेख मेरा वजूद 
जंग लग गयी क्या ,तेरी तलवार में ?

हो जहाँ तुम वहाँ पे जला लो दिये 
फिर रहे हो किस किस दयार में 

या दवा कर दे कोई मुकम्मल खुदा
या नज़र फेर ले मुझसे इक बार में 

आपने न पढ़ा ,आपने न सुना 
खामियां रह गयी होंगी अशरार में

अभी करने है मुझको बहुत काम "नील"
अभी दो दिन बचे हैं जो इतबार में 


.............................................
गुफ्तार:speech 
कूचा :place 
माजी :past 
सदा:sound 
दयार:country ,region 
अशरार:couplets

3 comments:

  1. हो जहाँ तुम वहाँ पे जला लो दिये
    फिर रहे हो किस किस दयार में

    ...बहुत खूब! बेहतरीन ग़ज़ल...

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  2. बेहतरीन अभिव्यक्ति.....

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  3. आपका बहुत आभार कैलाश जी
    बहुत धन्यवाद सुषमा जी

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...