Saturday, June 23, 2012

तुम मुझे आईना दिखाते रहो

अब  न  कोई  भी  दवा  लेता  हूँ ,
हंस  के  ही  दर्द  भुला  लेता  हूँ 

तुम  मुझे    आईना  दिखाते  रहो ,
मैं  तेरी  तश्वीर  बना  लेता  हूँ 

मैंने   भी  शाख   से   सिखा    है
अपनी  नज़रें  झुका  लेता  हूँ

ज़ख्म   जो  वक़्त  दे  गया  मुझको
उनको  ही  दोस्त   बना   लेता  हूँ

भर  के  कुछ  हर्फ़  में  साँसें
उनको  पन्नो  पे  सजा  लेता   हूँ

क़यामत   तो  अभी   भी   बाकी  है
थोड़ी    सी   जान  बचा   लेता  हूँ

लोग  उठाते  हैं  जाम -ए -ग़म  यारों
मैं  तो  बस  कलम  उठा  लेता  हूँ

तिनका  तिनका ही  मुहब्बत  काफी  है
नील  आँखों   में  छुपा  लेता  हूँ  

Sunday, June 17, 2012

शायर जीता मरता है चैन से अपनी ग़ज़लों में

नहीं चाहता खो जाऊं मैं बस रेशमी पन्नों में ,
नहीं चाहता डूबता जाऊं बस कुछ बीते लम्हों में

बिलख रहा था दूर कहीं ,तभी एक सदा आई दौड़ी
क्या देंगे भला क्या देंगे ओ माँ तुम्हारी चरणों में

 कई उलझन दे देती है ये ज़ीस्त हमारे दामन में
सुलझ गया मैं ज़र्रा ज़र्रा जब डूबूं तेरे सपनों में

मन का आँगन ,ख़्वाबों का गगन ,एक दिया चाहत का
नहीं चाहता उडूं गगन और धरती हो मेरे क़दमों में

बचपन ,चाहत ,अल्हड़पन ,सब रूह की ही जुबानी है
लब पे आ जाते हैं बन के ढलते उगते नगमों में

ये है उस रब की इनायत ,इसका नाम मुहब्बत है
बिन मांगे हि मिल जाये कभी ,न मिले कभी तो जन्मों में

वो अमराई ,वो कोयल ,वो बागवाँ ,और पुरवाई
अपना सा इक गाँव ढूंढता रहता है वो शहरों में

नील ढूँढना कब्र -ओ -महफ़िल में उसको मत घड़ी घड़ी
शायर जीता मरता है चैन से अपनी ग़ज़लों में

Saturday, June 9, 2012

गुनाहगार खुद को अब भी मानता है कोई


हर वक़्त क्यूँ रिश्तों से भागता है कोई 
क्यूँ तश्वीर दीवारों पर टाँगता है कोई 

इस जहाँ में हर मोड़ पे होते हैं तजुर्बे 
कहीं मिले सब कुछ दाना फाँकता है कोई 

साये के परदे  हि रह गए   हैं दामन में 
क्या नूर को भी नकारता है कोई

जब से आया है वो शहर में यारों 
लगता है कि ख्वाब अब बांटता है कोई 

न जाने क्या है उसका मोल ए साहब 
दीवानागी को क्यूँ आंकता है कोई 

हसरते मिलने की महफ़िल से रात भर 
लम्हा लम्हा हर घड़ी जागता है कोई 

हो न हों पूरी सुहानी ख्वाईशें दिल की 
बेशक खुद में खुद को ढालता है कोई 

हवाएं शाख को सहला कर चली गयीं 
कहता है हँस के दिल में झांकता है कोई 

ग़ाफिल है ज़माना इक अरसा गुज़र गया 
गुनाहगार खुद को अब भी मानता है कोई 

मुफलिसी न जाने कब से दोस्त बन बैठी 
उम्मीद आँखों में फिर भी पालता है कोई 

दिया जलाएगा नील आँखों के वीराने में 
आज जान-ओ-दिल से पुकारता है कोई 

Wednesday, June 6, 2012

जिस्म का बोझ उठाएगा कब तक

तू  खुद  को बहलायेगा कब तक
मखमली ख्वाब सजाएगा कब तक

जब नीब हिल गयी है इमारत की
तू मंजिलें ऊँची बनाएगा कब तक

सरहद है वहाँ ,जहां पे गुलशन थे
कोई फौजी घर अपने जाएगा कब तक

वो कश्ती न कर दे नीलाम कहीं
तू लहरों से दूर जाएगा कब तक

नकाबपोशों से आइना कह रहा है
तू मुझे आजमाएगा कब तक

रूह को जान ले मुसाफिर अपने
जिस्म का बोझ उठाएगा कब तक 

Friday, June 1, 2012

कोई हमको जगाता क्यूँ नहीं

अजनबी  कारवां  के  वास्ते  रात  जग  के  काटी  है 
चाँद  से  गुफ्तगू  करके   ख़्वाबों   को  भी   बांटी   है 
जब  सूरज  निकल  आया  तो  कोई  हमको  जगाता क्यूँ  नहीं 

आखिरी पंखुरिया


उस  किताब  में  उसके  लिखे   सारे   नज़्म   थे  
और  साथ  में  गुलाब  की  वो  आखिरी  पंखुरिया 


सुना  है  आज   किताब   भी  जल  गया  और  पंखुरिया  उसके  मज़ार   पर  हैं ....

Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...