Thursday, December 12, 2013

open your eye


the rays of the sun is floating amazingly in the palanquin of the sky
birds are chirping ,being amazed by its beauty,that how can it fly
the mother calls the child with a voice that have no match in this nature
o my little baby,the school bell will be ringing soon,so open your eye

so,open your eye....

Sunday, December 1, 2013

अँधेरा बुझाने के लिए सिर्फ रौशनी चाहिए


मशालों  को  दिये -बाती  से  मत  तौलो 
चाँद  सितारों  की  चालों  के  कहे  पर  न  चलो 


देखो  अँधेरा   बुझाने  के  लिए  सिर्फ   रौशनी  चाहिए !!

Friday, November 8, 2013

अभी तो बस शुरू हुआ है सफर



अभी तो बस, शुरू हुआ है सफर देखते रहो,
कि जब तलक ना हो कोई भी असर देखते रहो !

किनारे से नहीं आयेगी नज़र देखते रहो,
समंदर मे अब तुम भी उतर देखते रहो !

कुछ एक कूचा ,कूच एक डगर, बदल गये तो क्या,
अभी तो बदलेगा ये सारा शहर देखते रहो !

कई पर्दे , कई धूल , रोकेंगे अभी रास्ता,
संभाल कर ये अपनी आँखें मगर देखते रहो !

कहाँ कहता था मैं कभी ऐ मेरे हमदम,
कि मैं जो देखूँ तुझे तुम भी इधर देखते रहो !

कुछ एक नज़्म के दिये जले फिर काग़ज़ों पे आज,
यही है "नील" का छोटा सा इक घर देखते रहो !

Friday, November 1, 2013

न बुझाओ गम -ए -चिराग मयकदा जाकर !

न   जियो  गफ़लत  में  ,दिल  को रौशन कर लो

ख्वाब   सजाकर   खुद   को गुलशन    कर लो !!

नज़रों     में   न   तुम अक्श    को ढूँढा   करना  
महसूस   करो   रूह    को,उसे   दर्पण   कर लो!!

न  बुझाओ  गम -ए  -चिराग  मयकदा  जाकर  
खुशियों  के नगमो  में , उन्हें  दफ़न  कर  लो !! 

दिये - बाती  को मशालों   से  क्यूँ  तौलते  हो 
सिर्फ  अँधेरा मिट जाए   ,तुम  जतन   कर लो!!


तौफीक हथेली के लकीरों से नहीं मिलती "नील" 
कोशिशें आज  दिल-ओ-जान से दफतन कर लो !!


Sunday, September 1, 2013

ज़वाब के इंतज़ार में !

हम  तो  बेवस  हो  गए  "नील "
इक  अदद  ज़वाब  के  इंतज़ार  में 

कभी  हम  अशरारों  का
तो  कभी  चाँद   का  दीदार  करते  हैं

कोई  तो  आएगा  जो  खुश  हो  जाएगा
गर  ना  आया   तो  गम  में  ही  इक
खूबसूरत  ग़ज़ल  तयार  करते  हैं

ग़ालिब  होते  तो  कह  देते  कि
ये  ज़वाब  भी  रूह  के  रंग  के  हैं  "नील "
तू  देख  न  पायेगा ...

कुछ  ऐसा  लिख  "नील "
जो  खुद -बा -खुद  किसी  के
रूह  में  उतर  जाएगा ......

Thursday, August 8, 2013

रस्ता दिखाए हम

हर  वक़्त  आरज़ू  रहेगी  ..की  लौट  आयें  हम 
रूह  से   लिखी  नगमों  की  माला  बनाए  हम 

ज़माने  की  हर  रंग  से  हम  खेल  ही चुके  हैं 
आज  सतरंगी  सपनो  की  दुनिया  बसाए   हम 


जब  मन  में  ही  है  इश्वर  का  ठौर  दोस्तों 
तो  बेवजह  मंदिर  भला   क्यूँ  जाए  हम



फिर  आये  न  आये  ये  रुत  गाने  बजाने  की
आज  फिर  इक   खुशनुमा   नगमा  सुनाये   हम 



कोई  राहगीर  थक  न  जाए  इस  ज़माने  में 
उसको  भी  मंजिल  का इक  रस्ता दिखाए  हम 







Thursday, August 1, 2013

नास्ता

तीखा  मीठा  खट्टा  नास्ता
भुना  चना  या  भुट्टा  खास्ता !!

बताइये  आप  अपनी  फरमाइशें
हम  दिखायेंगे  ताज  का रास्ता !!

वहाँ  मिलेंगे  आलू  के  दम
और  मीठे  में  होंगे  रस कदम !!

नहीं  रहेगा  चाय   अकेला
रहेगा  पकवानों  का  मेला !!

आप  खायेंगे   ,सब  खायेंगे
अच्छे  अच्छे   पौष्टिक  नास्ता !!

तीखा  मीठा  खट्टा  नास्ता
भुना  चना   या  भुट्टा  खास्ता !!

Monday, July 1, 2013

हे कृष्ण गोविन्द गिरिधर मुरारी

हे कृष्ण गोविन्द गिरिधर मुरारी
जो हम है वो कृपा तुम्हारी!!


तुने ही आब-ओ -दाना दिया है
तू  ही तो है  इक  पालनहारी!!


गुरबत्त  में बस एक तू ही सखा है
ए नाथ ! तेरे बहुत हैं  आभारी!!


क्रोध ,अहमादि  से बचाना 
तू ही है दाता ,हम है भिखारी!!


चले हम सूरज की ओर हमेशा
मन  बने  निर्मल और  अविकारी  

करुणा करना हे  करुणा निधि 
हे द्वारिकापति रास बिहारी !!

मन मंदिर में बस जा केशव  
लाज बचाना सदा हमारी !!

हे कृष्ण गोविन्द गिरिधर मुरारी
जो हम है वो कृपा तुम्हारी...
























Saturday, June 1, 2013

oh life

oh life you are the teacher
you are the friend
you pave the way
and you itself amend
you are a song
with so many tunes
you can establish a fort from the
ruins
you are a poem
of the man
and
the woman
you are the one
that make them humane
i am your servant
serving your duty
i assure you
i will maintain
your nature's beauty
when i die you will leave me
but oh my life
my words will
be there
in your garden
flying with the birds and the bee...

Sunday, May 12, 2013

कुछ मुझको भी भान हुआ है




उर में मधुस्वप्न ,सिंचित  होगा 
आह्लादित तब ,शोणित होगा  


काव्य तब ही समुचित होगा 
जब मन तक आरोहित होगा


पूछो क्या  अवशोषित होगा 
और क्या कुछ प्रतिविम्बित होगा !


एक ज्वलंत है  प्रश्न निरंतर 
क्या सब कुछ प्रायोजित होगा ?


कुछ मुझको भी भान हुआ है 
आभास तुम्हे भी किंचित होगा !


वो दो  कदम न चल पायेगा 
स्वयं से ही जो पराजित होगा  ! 


कैसा है कोई ,दुःख में देखो 
सुख में सब  अलक्षित होगा !


मैं ढूंढूं वो जगह, हो व्याकुल 
जहाँ "मैं" भी तिरोहित होगा


मेरी अपनी नगरी  भी होगी 
कोई राजा न पुरोहित होगा 


सिन्धु नहीं पर ,पथिक भर पानी 
कुछ बूंदों से ही, संचित होगा 


"नील" नयन भी सब कहते हैं 
उनमे गगन समाहित  होगा 

***
उर :heart
आह्लादित :happy
शोणित :blood
समुचित :right
अवशोषित :absorbed
प्रतिविम्बित:reflected
किंचित :somewhat
अलक्षित : unnoticed
तिरोहित :disappear

Sunday, May 5, 2013

ए खुदा !क्या हो गया ?


जहान -ए-फिरदौस का अब कोई भरम ना दे 
ए खुदा !क्या हो गया ?, कि दर्द कम ना दे ?


दो पल में बदल जाए ,बस वो मौसम ना दे 
ये कब किया था पैरवी की हमको ग़म न दे 

तू न बता कि कितने काँटे हैं राहों में 
जा आज़ाद किया तुझको , कोई मरहम ना दे 

शेख, रोक मस्जिद में हमें जाने से लेकिन 
ये तो बहुत ज़ुल्म है , जो तू कलम ना दे 

ये ज़िन्दगी बस साँस लेना भर तो है नहीं 

गर तू खुदा है, सुन ,ऐसी साँसों को दम ना दे

मैं सोचता हूँ कैसे कोई खुद को समझेगा
तू उलझने ना दे ,अगर रंज-ओ-अलम ना दे

हाँ कोई नहीं तू तोड़ अब रोज़ कुछ हिस्सा
मेरे ख्वाब को एक दम से, मौला !अदम ना दे

निकले मगर कलम से स्याही की कुछ बूँदें
है जीस्त एक इम्तेहाँ ,तू आखें नम ना दे

चलता है ए खुदा तो चल काफिर के साथ तू
यूँ साथ अपने "नील" का बस, दो कदम ना दे 


****
फिरदौस :heaven
अदम :annihilation,destruction
अलम :व्यथा
जीस्त :life
काफिर :atheist

Wednesday, April 24, 2013

हम हैरान है उनकी दिल्लगी और हद देख कर


क्या छोड़ दूँ अब सफ़र ,कम रसद देख कर 
आसमाँ नहीं छुआ जाता ,अपना कद देख कर 

पंछी कहाँ रुकते हैं कभी सरहद देख कर 
हम हैरान है उनकी दिल्लगी और हद देख कर 

इक करार सा आया था तब मदद देख कर 
टूटा है दिल कुछ और ही मकसद देख कर 


बागवाँ तो खुश है बाग़ को गदगद देख कर
तूफाँ मगर खुश होगा ज़मीन-ओ-ज़द देख कर

मुश्किल है निभ जाना ,बहुत कठिन है रस्ता
आप कीजिएगा ,कोई भी ,अहद देख कर

ऐसा नहीं है कि कोई करे क़र्ज़ से तौबा
ले क़र्ज़ मगर खुद की आमद देख कर

खुद को अब पस-ए-आईना बिठा कर देख लें
तब यकीन सा हो जाएगा शायद देख कर

क्या दौर अब आ गया है कि शहर भर में
मिले आदमी को दाखिला बस सनद देख कर

देखना तो है अभी "नील" गगन के कई रंग
क्यों बैठ गए बस एक दो गुम्बद देख कर 

***
अहद :promise
सनद :प्रमाण लेख ,दस्तावेज

Saturday, April 6, 2013

फुर्सत के दिन चार ढूँढे ना मिले

 


फुर्सत के दिन चार ढूँढे ना मिले
सहरा में कभी बहार ढूँढे ना मिले

बचपन तो अब भी दिख जाए लेकिन
बचपन के वो यार ढूँढे ना मिले

खबरों की बाजारी होती रहती है
पर सच्चे अखबार ढूँढे ना मिले

तब सड़क के दोनों और दीखते थे दरख़्त
अब उनके कोई कतार ढूँढे ना मिले

मकतब में दानिश हमको लेनी थी
ढूँढा कई कई बार ढूँढे ना मिले

हम करते किसका इन्तिखाब यारों
अच्छे उम्मीदवार ढूँढे ना मिले

माना हैं अज़ीज़ बहुत कम अपने यारों
शहरों में अगयार ढूँढे ना मिले

ग़ालिब,मीर-ओ-फैज़ लिख गए अपने शेर
फिर वैसे कुछ असरार ढूंढें न मिले

"नील" ने मकाँ किया दीवान को अब तक
इस घर में दीवार ढूँढे ना मिले


***
सहरा :desert
दरख़्त :tree
मकतब :school
दानिश :knowledge
इन्तिखाब :choice
अगयार :rivals
शेर :couplet
असरार :couplets
दीवान :collection of poems

Thursday, April 4, 2013

कुछ तो गौर करो

कुछ  समझो  ,कुछ  तो गौर करो  
कोशिश  यारों   तुम  और  करो  


लाल  न  हो  जाए  धरती  कहीं 
आओ  चम्बल  को  चित्तौड़  करो 


रास्ता  मिल जायेगा  तुमको  भी 
चलो  फिर   से  शुरू  दौर   करो 


जो  फर्क  करते  हैं  रंगों  में यारों 
तुम  उनको  न  युहीं  सिरमौर  करो 


साहिलों  पे  न  बैठ  गिनो  कश्ती 
लहरों  पे  जाकर  अब  ठौर   करो 

Monday, April 1, 2013

चले आओ न हमसफ़र !

चले   आओ   न   हमसफ़र , आज मन   उदास   है 
हमें   पता   है   तू   यहीं कहीं   आस - पास   है!!  

तेरे   न  होने   से  गुलशन   गुल से मरहूम हो गया
क्या तुझे इल्म नहीं यारा  कि ,तू   कितना  ख़ास  है !!

शहर  में  ज़िन्दगी  की  ज़द्दोज़हत  बहुत है
यारा ,कोई  डर  नहीं  ,जब  संग  तेरे विश्वास  है !!

चलते  रहना  ,हिम्मत  से  ,और  पाना  मुकाम
जब  संगीत  रूह  में  है  ,तब  किसकी  तलाश  है !!

उसकी  रहमत  से  सुरमयी हो जाए हर इक सांस
हर  रूह  में  ही  कोई  मीरा,  तो कोई  रैदास  है !!

Monday, March 25, 2013

बात अब बेसबब नहीं होती


पहले होती थी अब नहीं होती
बात अब बेसबब नहीं होती

इससे बिछड़ा तो तीरगी को जाना
घर के आंगन मे शब नहीं होती

रस्म-ओ-राह दुनिया के खिलौने है
यहाँ तो , कोई अदब, नहीं होती

हर इक तमन्ना बुझ जाती है
यहाँ आकर के तलब नहीं होती

वो हुनर भी  तब खो जाती है
जूनून दिल में जब नहीं होती

घर से लौटे न  कोई "नील" कभी  
ये ख्याल दिल में कब नहीं होती

Saturday, March 9, 2013

इक सोच बुझ गया है ,इक ख्वाब बाकी है


हर डगर हर रास्ता, हाज़िर जवाबी है 
आईना हैरान है ,चेहरा किताबी है !

क्यों नहीं सुने है ,आह-ओ-फ़रियाद 
क्या खफा मुझसे, मेरा खुदा भी है ?


जो हमें कहते रहे थे हुनर वाला
उनकी अदालत में ही ,अब हुनर वादी है !

जाते जाते देखते जाना मेरी दहलीज़
हमने चौखट पर दीपक जला दी है

जब आप रुख को देख के मिजाज़ भाँप लें
तो भला न होने में भी क्या खराबी है ?

मेहनत से संभाला है इक फूल को अब तक
कि पंखुरी अब भी नयी सी है ,गुलाबी है

कहना कि जियें शायरों से बिना ग़ज़ल
ये तो जनाब उन पर बहुत बेनियाज़ी है

मंजिल पे पहुँच कर देखा है अपना हश्र
दरवाज़े पे ताला है ,न कोई चाभी है

मोहरा बना के देते हैं दिलासा निजाम का
जलवागरों की भला ये कैसी बाज़ी है

क्या ये चर्चा है ज़रूरी ,क्या चीज़ किसकी है
क्या ये कम नहीं कि जो है आधी-आधी है

काग़ज़ कलम दवात का बंदोवस्त कर दो
है शौक़ स्याही से भरूँ ,तश्वीर सादी है

गर बूँद भर ख़ुशी मिले ,सागर को भुला दूँ
क्या फ़िक्र फिर ग़म-ऐ-हयात बेमियादी है

कल खिलौना टूटने का ग़म ही नहीं था
बचपन छिना जब से, ये दिल एहतियाती है

जाते जाते सोचते जाएगा फिर राही
इक सोच बुझ गया है ,इक ख्वाब बाकी है

ये लहू कतरा नहीं है आतिश है इसमें "नील"
है राख का कुनबा ये जिस्म,इंकलाबी है 

*****
वादी : one who pleads for something
बेनियाज़ी :cruelty
बेमियादी :limitless
हयात :life
एहतियाती :taking precautions
निजाम:power,rule
आतिश :fire

Sunday, March 3, 2013

इंतज़ार-ए-शाम में हम सुबह को भूल गए


इंतज़ार-ए-शाम में हम सुबह को भूल गए 
कटघरा ,मुंसिब और जिरह को भूल गए 

याद रह गया उन महफिलों का दौर बस 
और इस दुनिया की हर जगह को भूल गए 

अपना भी अंदाज़-ए-ज़िन्दगी का था अजीब 
आपको भूलने की हर वजह को भूल गए 

आशनाई थी ही ऐसी जब मिले खुल कर मिले 

रस्म-ओ-रिवाज़-ओ-दूरियां हर गिरह को भूल गए

"नील" अपनी धुन में हम ग़ज़ल लिखते रहे
होने वाले हादसे और हर गिलह को भूल गए 

*******************************
गिलह: blame
जिरह:proceedings in court by a lawyer
मुंसिब :judge
आशनाई : love
गिरह :बन्धन

Friday, February 22, 2013

उम्मीद का दरिया भी है ,ग़म का समंदर भी


उम्मीद का दरिया भी है ,ग़म का समंदर भी 
कोई यहाँ ख़ाक में है ,कोई सिकंदर भी 

दोस्तों  देखे हैं हमने ,सभी एक हैं दिल से 
दिल्ली भी घुमे ,पटना  भी घुमे,पोरबन्दर भी 

ग़म है ,ख़ुशी है ,तीरगी है और उजाला है 
एक सा रहता नहीं देखो कलेण्डर भी 

घर बनाते हैं महानगरों में ये साहूकार 
रोशनी  जा न सकेगी जिसके अन्दर भी 

खून के छींटे परे हैं हर चौराहे पर 
खुद से बहुत है शर्मसार आज खंजर भी 

आदमी ही आदमी को खायेगा पुरजोर 
इक दिन हमें दिख जाए न ऐसा मंज़र भी 

एक ही के शोर से न जागेगा ये मुल्क 
आइये जवान,जाहिद और सुखनवर भी 

फ़र्ज़ को अपने कलम से बस निभाते जा 
इक रोज़ फिर बेशक झुकेगा "नील" अम्बर भी 

***************
तीरगी:darkness 
जाहिद :devotee ,a saint 
सुखनवर :poet 

Sunday, February 17, 2013

मैं जो चुप रहा तो फिर मेरी खता समझ गए

मैं जो चुप रहा तो फिर मेरी खता समझ गए 
ये वही लोग हैं जो बुत को खुदा समझ गए

हमको मिली है उम्र भर तहरीर करने की शगल 
ये दुआ थी मगर सब लोग सजा समझ गए

आप थे खामोश जब कटघरे में आये हम
आपकी गलती नहीं हम माजरा समझ गए

लफ्ज़ थे मेरे मगर ज़िक्र में कोई और था
पढने वाले पढ़ उन्हें हर वाकया समझ गए

इक कलम काग़ज़ से मिटी हर दर्द-ओ-ग़म
आज हम ज़ीस्त का ये मशविरा समझ गए

पाँव उतना ही पसारा ,थी हमारी जितनी कद
ज़ल्द ही खुद का मेरे दिल दायरा समझ गए

माँ सिखाती है हमें कई बार अब भी बा-ख़ुशी
कह चुके है हम उन्हें कि कई दफा समझ गए

खामोशियों में दब गयी है "नील" की हर नफ़स
आप उसको बिन सुने क्यों बेसुरा समझ गए

***********************
तहरीर :composition
ज़ीस्त:life
नफ़स :breath

Sunday, February 10, 2013

बहुत किरदार है अभी भी निभाने बाकी


बहुत किरदार है अभी भी निभाने बाकी 
अभी कई दास्ताँ है तुमको सुनाने बाकी 

उठा के चल रहे हैं क़र्ज़ कितने हम तो 
अभी भी क़र्ज़-ए -जहाँ कितने उठाने बाकी 

लिखेंगे काग़ज़ों पे हम कलम से ज़ज्बा 
है जब तलक ज़िन्दगी के फ़साने बाकी 

भुआ दिया है कई ग़म ,कई दर्द-ए-सफ़र 
अभी कुछ और भी हैं दर्द भुलाने बाकी

कहाँ जोड़े है हमें शेख जी ये दैर -ओ-हरम
तो क्यों रहें न शहर में बस मयखाने बाकी

बची है आपकी दी हुई ये मुझको कलम
बचा है आज सिर्फ याद सिरहाने बाकी

जला चूका हूँ मैं इक चराग आँगन में
और ग़ज़ल में अभी तेरे दिये जलाने बाकी

रहेगा जौक तेरा हर ग़ज़ल में मेरे सनम
हैं जब तलक जहाँ में आपके दीवाने बाकी

न जाने मंजिल-ए -मक़सूद कब आएगी
न जाने मोड़ अब कितने हैं आने बाकी

कभी कभी मैं काशिद से पूछता हूँ "नील"
रहेंगे साथ अपने ख़त ही क्या पुराने बाकी

*****
दैर -ओ-हरम :place of worship
जौक:taste
काशिद :messenge

Sunday, February 3, 2013

मेरा घर तनहा सही ,मेरा घर छोटा सही



बादा -ए-सबा नहीं बस हल्का सा झोका सही 
आप मेरे हैं सनम ये भी मेरा धोखा सही 

आपकी यादों से हैं रौनकें हर ईंट में 
मेरा घर तनहा सही ,मेरा घर छोटा सही 

आपके आने पे हमने यूँ तो सजदा ना किया 
आपके जाने पे लेकिन हमने तो रोका सही 

बचपना ,वो शोखियाँ ,सब लौट जाती दोस्तों 
एक बार ही मगर ये भी सच होता सही 


मिल जाए हल कोई, ना भी मिले तो ग़म नहीं 
आपने हालात पर कुछ देर तो सोचा सही 

क्या हुआ जो ईद में भी दूर हैं हर जौक़ से
क्या हुआ अब भी हम कर रहे रोज़ा सही

शोर-ओ-गुल और हाय हाय क्यों मचाएं दोस्तों
जो हुआ सब था सही ,और जो होगा सही

आपने उस पर लिखी उस नज़्म को ना पढ़ा
"नील" की काग़ज़ से लेकिन अश्क को पोछा सही

**************************

जौक़ :taste

Friday, February 1, 2013

उमीदों का दामन क्यों हैं सब उतारे हुए



उमीदों का दामन क्यों हैं सब उतारे हुए
क्या हुआ जो शज़र के फल न तुम्हारे हुए !!

सारे मुश्किलात मिट गए पल भर में में
जब स्वयं कन्हैय्या , हमारे खेवनहारे हुए !!

मरुभूमि में भी हरियाली आ गयी
जब हम सब  दीनवत्सल  के, द्वारे हुए!!

हीरे - मोती का हम अब क्या करें
बस इक साथ प्रीतम का  , हमें सँवारे हुए !!

चिराग -ए -दिल जलती रहेगी बदस्तूर
क्या हुआ , जो बेदर्द चाँद -सितारे हुए

दिए बनाने वाले कुम्हार से पुछा करना
कितने घर -आँगन में , कल उजियारे हुए !!

ये रूप है तेरा तब तक ही  ओ "नील "
जब तक तेरे सारे आचरण,  प्यारे हुए !!


२८ जून २०११

Sunday, January 27, 2013

वो दौर याद है तुम करते थे जब वाह-वाह


मत पूछिए फ़िराक में अब हाल कैसा था 
कि रोशनी कैसे हुई ,मशाल कैसा था 

फौजी जो घर गया तो इकबाल कैसा था 
कोई क्या कहें कि उनका जलाल कैसा था 

बादल भी आये कि नहीं खेत तक वहाँ 
उस गाँव का बीता हुआ साल कैसा था 

काफिर किसे सब लोग कह रहे थे वहाँ 
अब की खुदा के नाम पर बवाल कैसा था 

फूटपाथ पर दो चार बचपन दिखे थे कल 
उन मासूम निगाहों में सवाल कैसा था 

खामोशियाँ करती दिखी थी रक्स कुछ ऐसे 
साज था कैसा ,सुर-ओ-ताल कैसा था 

बच्चे जहां पे खेलते थे हो के बेपरवा 
जाने वो बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल कैसा था 

वो दौर याद है तुम करते थे जब वाह-वाह !
और पूछता था मैं,मेरा ख्याल कैसा था ?

अबकि धुआँ भी नहीं देखा कहीं पर फिर 
पानी में आ रहा था जो उबाल कैसा था 

यूँ तो नहीं रोक था हमें जाते हुए तुमने 
फिर यार चेहरे पर तेरे मलाल कैसा था !

मत पूछिये तिनका कहाँ बिखरा है आज "नील" 
आँधी से हुआ नीड़ पायमाल कैसा था 

**************************
फ़िराक: separation
इकबाल:success ,good fortune 
जलाल ; splendor,majesty 
काफिर:atheist,naastik

रक्स :dance
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल:playground for children 
पायमाल :ruined

Wednesday, January 23, 2013

अपनी धुन में रहने वाले

अपनी धुन में रहने वाले ये तो  बता तेरा नाम है क्या 
जुर्म की कोई नयी सजा है या फिर एक ईनाम  है क्या ?

कूचा कूचा ,ज़र्रा ज़र्रा ,रफ्ता रफ्ता ,घड़ी घड़ी 
मत पूछो यारों राही का, भी कोई अंजाम है क्या ?

एक मेरा कोर सा काग़ज़ ,एक तेरी नन्ही  सी कलम 
स्याही भरना,लफ्ज़ पिरोना, इस से इतर कोई काम है क्या ?

ए दूर से आने  वाले  पंछी ,ओ चूं   चूं गाने वाले पंछी 
ये तो बता दे ,पास तेरे ,घर का कोई पयाम है क्या 

आलम था कुछ ऐसा ही ,और था ऐसा दीवानापन 
कि न दिन की  कोई खबर रही ,न सोचा कि शाम है क्या 

फौजी सरहद पे जीता है ,रोता ,हँसता ,मरता है 
कोई भी मौसम हो उनकी दुनिया में आराम है क्या 

सोने की कीमत है साहिब ,मिट्टी का कोई मोल नहीं 
जीते मरते इस माटी  में इसका कोई दाम है क्या 

पैमाना तू मत दे साकी,हमें ज़िन्दगी  काफी है 
पीने वाले क्या समझेंगे ,कि इसकी  दो जाम है क्या 

रहती है क्यों अब खुद से अनजानी सी आँख मेरी 
"नील" तरसती आँखों में ख़्वाबों का निजाम है क्या 
................................
निजाम:rule 

Sunday, January 13, 2013

आँखों की तपिश देर तक आँखों में रहेगी


आँखों की तपिश देर तक आँखों में रहेगी 
मुझ सी ही सीरतें मेरी राखों में रहेगी 

तब तक ही रहेगा वजूद आपका साहब 
जब तक की सच्चाई  बातों में रहेगी 

तुम तेग उठाओ या बारूद समेटो 
कापी कलम स्याही मेरी हाथों में रहेगी 

तुम देख लेना जब बयाँ होगी सच्चाई 
तब उंगलियाँ सब की यहाँ दाँतों में रहेगी 

युहीं अगर चुपचाप सारे देखते रहे 
तो सिसकियाँ हर मोड़ और राहों में रहेगी 

मैं सोचता हूँ रोज़ ही कुछ देर के लिए 
महफूज़ कब ये ज़िन्दगी रातों में रहेगी 

ये कहाँ सोचा था बिछड़ने के बाद "नील"
कि  उनकी छवि हर वक़्त यादों में रहेगी 

Sunday, January 6, 2013

ख्वाब सी है ज़िन्दगी

ख्वाब देखती हैं आँखें ,ख्वाब सी  है ज़िन्दगी 
अपनी तो कापी कलम किताब सी  है ज़िन्दगी 

कभी है महफिलों का शोर ,है जश्न-ए -दुनिया 
कभी खामोश लबों  की जवाब सी है ज़िन्दगी 

खुश्बू भी है ,खार भी है ,जीत है ,हार भी है 
लगता हैं क्यूँ हर घड़ी  गुलाब सी है ज़िन्दगी 

कैसी है ये खलिश ,कैसी तमन्ना है जवाँ 
जाने किस किस जुर्म की हिसाब सी है ज़िन्दगी 

छुप नहीं सकता है यारा तेरे रुख से माजरा 
कहते हो फिर भी कि लाजवाब सी है ज़िन्दगी 

ओढ़ लेता है इसे हर आदमी मौत तक 
उस खुदाया से मिली नकाब सी है ज़िन्दगी 

सहर से ये शाम तक है दौड़ती  राह पर
जलती बुझती एक आफताब सी है ज़िन्दगी 

बिन पिए ही हो गया है नशा मुझे देर तक 
ऐसी अलबेली इक शराब सी है ज़िन्दगी 

खुद से लडती हुई है नील ये इक दास्ताँ 
कुछ अलग सी एक इन्कलाब सी है ज़िन्दगी 

Wednesday, January 2, 2013

पढ़ गया

इस  शहर  में  ईमान  ऐसे  मर  गया 
इक  मसीहा  क़त्ल  होके  घर   गया

ज़ुल्म  की  खेती  तो  सर -ए -आम  है
गोदाम  में  अनाज  लेकिन  सड़  गया

कातिल  बन  गया  है मुनसिब देख लो
लोग  कह  रहे  हैं  कि वो  सुधर  गया

तुम  मायने  देखो  न  दोस्त ग़ज़ल  का
ये  क्यूँ  कहते  हो  कि  इसका बहर गया

क्या फ़राज़ क्या ग़ालिब मोमिन-ओ-फैज़
आज  नील  पूरे दिल  से  सबको  पढ़  गया 

Tuesday, January 1, 2013

साथ ही रहने दो

उसे उसके साथ ही रहने दो अलग न करो ..
थपेरों वो सह नहीं पायेंगे तूफ़ान के... 

शीशे को खश में संभाल कर ही रखा जाता है !