Sunday, January 13, 2013

आँखों की तपिश देर तक आँखों में रहेगी


आँखों की तपिश देर तक आँखों में रहेगी 
मुझ सी ही सीरतें मेरी राखों में रहेगी 

तब तक ही रहेगा वजूद आपका साहब 
जब तक की सच्चाई  बातों में रहेगी 

तुम तेग उठाओ या बारूद समेटो 
कापी कलम स्याही मेरी हाथों में रहेगी 

तुम देख लेना जब बयाँ होगी सच्चाई 
तब उंगलियाँ सब की यहाँ दाँतों में रहेगी 

युहीं अगर चुपचाप सारे देखते रहे 
तो सिसकियाँ हर मोड़ और राहों में रहेगी 

मैं सोचता हूँ रोज़ ही कुछ देर के लिए 
महफूज़ कब ये ज़िन्दगी रातों में रहेगी 

ये कहाँ सोचा था बिछड़ने के बाद "नील"
कि  उनकी छवि हर वक़्त यादों में रहेगी 

7 comments:

  1. तुम देख लेना जब बयाँ होगी सच्चाई
    तब उंगलियाँ सब की यहाँ दाँतों में रहेगी ...

    बहुत खूब ... कमाल का शेर है हकीकत की बयानी करता हुवा ...

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 15/1/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है

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  3. पूरी ही ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी ...बस राखों शब्द के मायने समझ नहीं आये ...

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  4. bahut dhanyavaad digambar ji
    bahut aabhaar rajesh ji rachna ko sarahane aur charch manch mme prastut karne ke liye
    aabhaari hoon mayank da
    bahut shukriya sharda ji

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  5. मैं सोचता हूँ रोज़ ही कुछ देर के लिए
    महफूज़ कब ये ज़िन्दगी रातों में रहेगी
    न जाने कब होगा यह वैसे आज को हालात हैं उन्हें देखते हुए तो नहीं लगता की ऐसा भी होगा कभी...सारगर्भित अभिव्यक्ति

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  6. dhanyavaad pallavi ji
    aasha hai haalaat sudherenge

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