Sunday, February 10, 2013

बहुत किरदार है अभी भी निभाने बाकी


बहुत किरदार है अभी भी निभाने बाकी 
अभी कई दास्ताँ है तुमको सुनाने बाकी 

उठा के चल रहे हैं क़र्ज़ कितने हम तो 
अभी भी क़र्ज़-ए -जहाँ कितने उठाने बाकी 

लिखेंगे काग़ज़ों पे हम कलम से ज़ज्बा 
है जब तलक ज़िन्दगी के फ़साने बाकी 

भुआ दिया है कई ग़म ,कई दर्द-ए-सफ़र 
अभी कुछ और भी हैं दर्द भुलाने बाकी

कहाँ जोड़े है हमें शेख जी ये दैर -ओ-हरम
तो क्यों रहें न शहर में बस मयखाने बाकी

बची है आपकी दी हुई ये मुझको कलम
बचा है आज सिर्फ याद सिरहाने बाकी

जला चूका हूँ मैं इक चराग आँगन में
और ग़ज़ल में अभी तेरे दिये जलाने बाकी

रहेगा जौक तेरा हर ग़ज़ल में मेरे सनम
हैं जब तलक जहाँ में आपके दीवाने बाकी

न जाने मंजिल-ए -मक़सूद कब आएगी
न जाने मोड़ अब कितने हैं आने बाकी

कभी कभी मैं काशिद से पूछता हूँ "नील"
रहेंगे साथ अपने ख़त ही क्या पुराने बाकी

*****
दैर -ओ-हरम :place of worship
जौक:taste
काशिद :messenge

2 comments:

  1. लिखेंगे काग़ज़ों पे हम कलम से ज़ज्बा
    है जब तलक ज़िन्दगी के फ़साने बाकी ..

    बहुत खूब .. जिंदादिली इसी को कहते हैं ...
    सभी शेर लाजवाब हैं इस गज़ल के ...

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  2. आपका बहुत आभार दिगंबर जी

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...