Monday, March 25, 2013

बात अब बेसबब नहीं होती


पहले होती थी अब नहीं होती
बात अब बेसबब नहीं होती

इससे बिछड़ा तो तीरगी को जाना
घर के आंगन मे शब नहीं होती

रस्म-ओ-राह दुनिया के खिलौने है
यहाँ तो , कोई अदब, नहीं होती

हर इक तमन्ना बुझ जाती है
यहाँ आकर के तलब नहीं होती

वो हुनर भी  तब खो जाती है
जूनून दिल में जब नहीं होती

घर से लौटे न  कोई "नील" कभी  
ये ख्याल दिल में कब नहीं होती

4 comments:

  1. बहुत खूब ... सभी शेर लाजवाब ... सीधे अर्थ लिए ...

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    रंगों के पर्व होली की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामंनाएँ!

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल 26/3/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका स्वागत है ,होली की हार्दिक बधाई स्वीकार करें|

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  4. दिगम्बर जी आपका बहुत आभार
    बहुत आभार मयंक दा ,
    बहुत शुक्रगुज़ार हूँ राजेश जी
    सभी को होली पर्व की शुभकामनायें

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