Friday, February 22, 2013

उम्मीद का दरिया भी है ,ग़म का समंदर भी


उम्मीद का दरिया भी है ,ग़म का समंदर भी 
कोई यहाँ ख़ाक में है ,कोई सिकंदर भी 

दोस्तों  देखे हैं हमने ,सभी एक हैं दिल से 
दिल्ली भी घुमे ,पटना  भी घुमे,पोरबन्दर भी 

ग़म है ,ख़ुशी है ,तीरगी है और उजाला है 
एक सा रहता नहीं देखो कलेण्डर भी 

घर बनाते हैं महानगरों में ये साहूकार 
रोशनी  जा न सकेगी जिसके अन्दर भी 

खून के छींटे परे हैं हर चौराहे पर 
खुद से बहुत है शर्मसार आज खंजर भी 

आदमी ही आदमी को खायेगा पुरजोर 
इक दिन हमें दिख जाए न ऐसा मंज़र भी 

एक ही के शोर से न जागेगा ये मुल्क 
आइये जवान,जाहिद और सुखनवर भी 

फ़र्ज़ को अपने कलम से बस निभाते जा 
इक रोज़ फिर बेशक झुकेगा "नील" अम्बर भी 

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तीरगी:darkness 
जाहिद :devotee ,a saint 
सुखनवर :poet 

Sunday, February 17, 2013

मैं जो चुप रहा तो फिर मेरी खता समझ गए

मैं जो चुप रहा तो फिर मेरी खता समझ गए 
ये वही लोग हैं जो बुत को खुदा समझ गए

हमको मिली है उम्र भर तहरीर करने की शगल 
ये दुआ थी मगर सब लोग सजा समझ गए

आप थे खामोश जब कटघरे में आये हम
आपकी गलती नहीं हम माजरा समझ गए

लफ्ज़ थे मेरे मगर ज़िक्र में कोई और था
पढने वाले पढ़ उन्हें हर वाकया समझ गए

इक कलम काग़ज़ से मिटी हर दर्द-ओ-ग़म
आज हम ज़ीस्त का ये मशविरा समझ गए

पाँव उतना ही पसारा ,थी हमारी जितनी कद
ज़ल्द ही खुद का मेरे दिल दायरा समझ गए

माँ सिखाती है हमें कई बार अब भी बा-ख़ुशी
कह चुके है हम उन्हें कि कई दफा समझ गए

खामोशियों में दब गयी है "नील" की हर नफ़स
आप उसको बिन सुने क्यों बेसुरा समझ गए

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तहरीर :composition
ज़ीस्त:life
नफ़स :breath

Sunday, February 10, 2013

बहुत किरदार है अभी भी निभाने बाकी


बहुत किरदार है अभी भी निभाने बाकी 
अभी कई दास्ताँ है तुमको सुनाने बाकी 

उठा के चल रहे हैं क़र्ज़ कितने हम तो 
अभी भी क़र्ज़-ए -जहाँ कितने उठाने बाकी 

लिखेंगे काग़ज़ों पे हम कलम से ज़ज्बा 
है जब तलक ज़िन्दगी के फ़साने बाकी 

भुआ दिया है कई ग़म ,कई दर्द-ए-सफ़र 
अभी कुछ और भी हैं दर्द भुलाने बाकी

कहाँ जोड़े है हमें शेख जी ये दैर -ओ-हरम
तो क्यों रहें न शहर में बस मयखाने बाकी

बची है आपकी दी हुई ये मुझको कलम
बचा है आज सिर्फ याद सिरहाने बाकी

जला चूका हूँ मैं इक चराग आँगन में
और ग़ज़ल में अभी तेरे दिये जलाने बाकी

रहेगा जौक तेरा हर ग़ज़ल में मेरे सनम
हैं जब तलक जहाँ में आपके दीवाने बाकी

न जाने मंजिल-ए -मक़सूद कब आएगी
न जाने मोड़ अब कितने हैं आने बाकी

कभी कभी मैं काशिद से पूछता हूँ "नील"
रहेंगे साथ अपने ख़त ही क्या पुराने बाकी

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दैर -ओ-हरम :place of worship
जौक:taste
काशिद :messenge

Sunday, February 3, 2013

मेरा घर तनहा सही ,मेरा घर छोटा सही



बादा -ए-सबा नहीं बस हल्का सा झोका सही 
आप मेरे हैं सनम ये भी मेरा धोखा सही 

आपकी यादों से हैं रौनकें हर ईंट में 
मेरा घर तनहा सही ,मेरा घर छोटा सही 

आपके आने पे हमने यूँ तो सजदा ना किया 
आपके जाने पे लेकिन हमने तो रोका सही 

बचपना ,वो शोखियाँ ,सब लौट जाती दोस्तों 
एक बार ही मगर ये भी सच होता सही 


मिल जाए हल कोई, ना भी मिले तो ग़म नहीं 
आपने हालात पर कुछ देर तो सोचा सही 

क्या हुआ जो ईद में भी दूर हैं हर जौक़ से
क्या हुआ अब भी हम कर रहे रोज़ा सही

शोर-ओ-गुल और हाय हाय क्यों मचाएं दोस्तों
जो हुआ सब था सही ,और जो होगा सही

आपने उस पर लिखी उस नज़्म को ना पढ़ा
"नील" की काग़ज़ से लेकिन अश्क को पोछा सही

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जौक़ :taste

Friday, February 1, 2013

उमीदों का दामन क्यों हैं सब उतारे हुए



उमीदों का दामन क्यों हैं सब उतारे हुए
क्या हुआ जो शज़र के फल न तुम्हारे हुए !!

सारे मुश्किलात मिट गए पल भर में में
जब स्वयं कन्हैय्या , हमारे खेवनहारे हुए !!

मरुभूमि में भी हरियाली आ गयी
जब हम सब  दीनवत्सल  के, द्वारे हुए!!

हीरे - मोती का हम अब क्या करें
बस इक साथ प्रीतम का  , हमें सँवारे हुए !!

चिराग -ए -दिल जलती रहेगी बदस्तूर
क्या हुआ , जो बेदर्द चाँद -सितारे हुए

दिए बनाने वाले कुम्हार से पुछा करना
कितने घर -आँगन में , कल उजियारे हुए !!

ये रूप है तेरा तब तक ही  ओ "नील "
जब तक तेरे सारे आचरण,  प्यारे हुए !!


२८ जून २०११