Sunday, December 28, 2014


Tootati hai lahar kab saahil se pahle,
meel ke patthar na gin manzil se pahle
kya kahe koi to mujh me mujhsa tha,
poochta hoon sawaal dil se pahle
aaj dekhoonga gham kaise hoga maayus,
Aa gaya aamdaa us kaatil se pahle
baad tanhaai se pooch loonga neel,
pooch leta hoon ab mehfil se pahle

Tuesday, September 9, 2014

yun zuda sa na raha karna kabhi


यूँ  जुदा  सा  न   रहा  करना  कभी   मुहब्बत  में 
कोई  हसीं  ग़ज़ल  ही  कहना  गम -ए -फुरकत  में 


गुल के  खिलने  पे  ज्यूँ   बागवां  खुश  होता   है 
वो  खुशी नहीं है मुमकिन किसी भी शोहरत  में 


कुछ  दुआएं ,कुछ  यादें,  संग   रह   जाती  हैं 
जानशीन तो  मौजूद  रहती  है  हर   मन्नत  में 


ये  लहरें  ही  मांझी  की  रहनुमा   हैं  नील 
दर्द  ही  है  तेरी  दवा ,न  रहना तुम  गफलत   में 


गर  मंज़ूर  है  कि  तन्हाई  ही  तेरी  मंजिल  है  
तो  है  ये  हुस्न -ओ -वफ़ा   तेरी  खिदमत  में  

Saturday, May 24, 2014

बस कि अब

रास्तें भी हैं वहीँ,मंज़िलें भी हैं वहीँ
ज़िन्दगी है ये जहाँ, मुश्किलें भी, हैं वहीँ

बस कि अब रंग-ए-आसमाँ  ही और है
मशगले भी हैं वहीँ,हसरतें भी, हैं वहीँ

है मरासिम न मोहताज़-ए-दीद कभी
चाहतें भी हैं वहीँ , सरहदें भी, हैं वहीँ

रूबरू आँधियों से हो रही हैं हर लम्हें
ज़हमतें हैं जहाँ , रहमतें भी, हैं वहीँ

हो मुलाक़ात मगर ,जैसे कोई ठंडी लहर
आदतें न बदलीं , फ़ितरतें भी ,हैं वहीँ

"नील" सुनता है ,समझता है,चुप रहता है
फैसले भी हैं वहीँ ,उल्फतें भी ,हैं वहीँ

Sunday, March 23, 2014

कल की कोई परछाई


कल की कोई परछाई आज पीछा करती है 
काग़ज़ों पे मेरे तश्वीर खिंचा करती है 

नज़्म नज़्म खिलते हैं ,धुन से धुन मिलती है 
हर्फ़ हर्फ़ से मेरे मन को सिंचा करती है 

उलझनें बहुत हैं इस जहान में मगर 
वो हर बात बस सीधा सीधा करती है 

हर इक मोड़ पे ,हर सफ़र के दरमियाँ 
हो सुकून कैसे ,ज़िन्दगी सिखा करती है

ये ज़िन्दगी किसी और से हारेगी क्या
खुद से हारती है,खुद से जीता करती है

Monday, March 3, 2014

तन्हाई


गर  हमने  वफ़ा  की  है  ,तो  ये  अपनी  कहानी  है 
और  उसने  दुआ  दी  है  ,ये  उनकी  मेहेरबानी  है 


बता  दे  आज  ,कब  ये  बोलता  है , कोई  भी  ,दाता 
की  बोल  तुझमे , और  मुझसा  , कौन  दानी  है 


मोहब्बत   इक  तूफां  नहीं  जो  आकर  गुज़र  जाए 
इसका  न  तो  बुढापा  है  ,और  ना  ही   जवानी  है 


बड़े  बे -आबरू  होकर  हम  लौटे  उनके  कूचे  से 
कहा  तन्हाई  ही , तुम   आशिकों  की  ,जिंदगानी  है 


हमें  उनका  हाल -ए-दिल पता अब चल ही  जाता  है 
हर  मोड़  पे  जब उनके ही   चर्चों  की  कहानी  है 

Saturday, February 22, 2014

आज कुछ हर्फों में

बारहा खुद से तुम न युहीं लड़ो यारों 
इक दफा खुद की भी बात तो सुन लो यारों 

जिस तरफ कोई शख्स भी नहीं जाता ,
उस तरफ मुझको, आज ,ले चलो यारों 

या तो महफ़िल मे चुप यूँहीं रहने दो ,
और बस तुम ही तुम, गुफ्तगू करो यारों 

बस कि कुछ देर सही दूर उन लहरों से 
तन्हा साहिल पे भी, आज तुम रुको यारों

दौर कैसा भी हो ,बस यही कोशिश थी
कोई रुसवा हमसे न कभी भी हो यारों

जो जुबाँ से कभी कह सका नहीं शायर
आज कुछ हर्फों में ढूँढ कर पढ़ो यारों

ख्वाब तो देखो तुम "नील" आँखों से मगर
राह चलते चलते न ख्वाइशें कहो यारों

Sunday, February 2, 2014

intrinsic qualities

WHEN we lost the property ,we suffer only for some years
and finally can overcome it by our diligence but when we lose the character and the dignity,we suffer our whole life
then it's no matter that we are right or wrong because the character is an intrinsic quality
and the world is not rational in judging the intrinsic qualities.

Saturday, February 1, 2014

अधलिखा किताब


इक   अधलिखा  किताब  रात  भर  जागता  है 
सुबह के इंतज़ार में बस सन्नाटे   को  सुना करता है 


जब  इंतज़ार  ख़त्म  होती  है  तो   पहली   किरण   एक  और पन्ना   भर  देती  है  चुपके  से ...

Sunday, January 26, 2014

नज़्म कहते हैं किसे और ग़ज़ल कहाँ पर है

नज़्म कहते हैं किसे और ग़ज़ल कहाँ पर है
कौन सी बात दिल में और क्या जुबाँ पर है

बंदगी ,बेकली ,दर- ब-दर का फिरना
जाने इलज़ाम क्या क्या मेरे गिरेबाँ पर है

क्यों बदलने सी लगी हैं शहर की नज़रें
कल तलक थी ज़मीं पर आज आसमाँ पर है

आज फिर मुंसिफ़ का फैसला होना है
आज फिर अपनी नज़र आपके बयाँ पर है

जाने है यकीं किसको "नील" आँखों का और
जाने किसको न यकीं तेरे दास्ताँ पर है

Sunday, January 12, 2014

जाते जाते भी हक़ यूँ अदा कीजिये


न हो हम से खता, ये दुआ कीजिये 
अब जो कीजिये बस बज़ा कीजिये 

कोई ले जाएगा पार दरिया में बस 
आप गफलत में यूँ न रहा कीजिये 

हैं मुश्किल बहुत और साँसें हैं कम 
यही ज़िन्दगी है तो क्या कीजिये 

हमें फिर ग़ज़ल में ही ढूँढेंगे आप 
भले अपने दिल से दफा कीजिये

बहुत से भरम हो रहे हैं हमें
हमें आप अब ख़फ़ा कीजिये

कोई हक़, छीनने का न दावा करे
जाते जाते भी हक़ यूँ अदा कीजिये

टूट जाएँ  जो आँखों के ख्वाब कभी 

तो फिर से शुरू सिलसिला कीजिये 

यूँ तो मिलते हैं दुनिया से ,मिलते रहें 

कभी हमसे भी हँस  के मिला कीजिये 

दोस्ती और मुहब्बत भी है रहमतें 

बस पत्थर को ही न खुदा कीजिये 

"नील " करता रहेगा वही मशगला 
पहले उसकी शग़ल  तयशुदा कीजिये 

Wednesday, January 1, 2014

हम भी उनके दीवाने थे


वो  आये  ख़्वाबों  में  दफतन एक रात 
राज़ -ए  -दिल   मगर  वहां  भी  न  बोले  


हम  भी  उनके दीवाने  थे  ,ना  आवाज़  दी  उनको !!