Sunday, March 23, 2014

कल की कोई परछाई


कल की कोई परछाई आज पीछा करती है 
काग़ज़ों पे मेरे तश्वीर खिंचा करती है 

नज़्म नज़्म खिलते हैं ,धुन से धुन मिलती है 
हर्फ़ हर्फ़ से मेरे मन को सिंचा करती है 

उलझनें बहुत हैं इस जहान में मगर 
वो हर बात बस सीधा सीधा करती है 

हर इक मोड़ पे ,हर सफ़र के दरमियाँ 
हो सुकून कैसे ,ज़िन्दगी सिखा करती है

ये ज़िन्दगी किसी और से हारेगी क्या
खुद से हारती है,खुद से जीता करती है

2 comments:

  1. इसी का नाम जिंदगी है ... खुद से है मुकाबला बस ...
    भावपूर्ण ...

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