Sunday, March 23, 2014

कल की कोई परछाई


कल की कोई परछाई आज पीछा करती है 
काग़ज़ों पे मेरे तश्वीर खिंचा करती है 

नज़्म नज़्म खिलते हैं ,धुन से धुन मिलती है 
हर्फ़ हर्फ़ से मेरे मन को सिंचा करती है 

उलझनें बहुत हैं इस जहान में मगर 
वो हर बात बस सीधा सीधा करती है 

हर इक मोड़ पे ,हर सफ़र के दरमियाँ 
हो सुकून कैसे ,ज़िन्दगी सिखा करती है

ये ज़िन्दगी किसी और से हारेगी क्या
खुद से हारती है,खुद से जीता करती है

Monday, March 3, 2014

तन्हाई


गर  हमने  वफ़ा  की  है  ,तो  ये  अपनी  कहानी  है 
और  उसने  दुआ  दी  है  ,ये  उनकी  मेहेरबानी  है 


बता  दे  आज  ,कब  ये  बोलता  है , कोई  भी  ,दाता 
की  बोल  तुझमे , और  मुझसा  , कौन  दानी  है 


मोहब्बत   इक  तूफां  नहीं  जो  आकर  गुज़र  जाए 
इसका  न  तो  बुढापा  है  ,और  ना  ही   जवानी  है 


बड़े  बे -आबरू  होकर  हम  लौटे  उनके  कूचे  से 
कहा  तन्हाई  ही , तुम   आशिकों  की  ,जिंदगानी  है 


हमें  उनका  हाल -ए-दिल पता अब चल ही  जाता  है 
हर  मोड़  पे  जब उनके ही   चर्चों  की  कहानी  है