Sunday, November 1, 2015

उम्मीद

होंगे वहीँ शायद  रेत पर बने हमारे कदमो के निशाँ
जिसे हमने ढक दिया  था इक पत्थर के नीचे... 

लहरों में भी इतनी दया होती है कि वो  दिलवालों को अलग नहीं करते ....... 

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किनारा

चलो  इक  और  किनारा  आ गया है मांझी , किश्ती  को  रोकना   मत ! समुंदर  में  तैरने  के  लिए  बहुत  से  तिनके  समेट  लिए  हैं  मैंने  सफ़र...