Friday, March 6, 2015

सागर अभी तो कारवाँ और भी है


बस दरिया नहीं आबे-रवाँ और भी है 
सागर अभी तो कारवाँ और भी है 

काशिद बना है कलम,मकाँ पन्ना,
यारब जीने का गुमाँ और भी है 

मन का हिरन चला जाता है दूर दूर
आँखों से अलग इक जहाँ और भी है 

सहराओं में बस नहीं हैं रेत के चट्टान,
इस दश्त में कुछ निहाँ और भी है 

चलते रहो कि है बहुत लम्बा सफ़र,
आगे तो सुदो-जियाँ और भी है 

आखिरी पन्ना भी हो गया ख़तम ,
इस किताब की दास्ताँ और भी है 

*निहाँ : छुपा 
*सुदो-जियाँ :लाभ-हानि 
*आबे-रवाँ : प्रवाह में बहता हुआ पानी 
*काशिद : डाकिया


सिखा है उसी से हमने ग़ज़लगोई भी ,
बड़ी काम की है उसकी साफगोई भी 

फिर कोई पल हमने संजोई भी ,
फिर से कलम स्याही में डुबोई भी 

ग़ालिब तेरे अशरार में क्या बात है ,
जो देर तक खो जाये उनमे कोई भी 

आज फिर बादल आ कर के गए ,
आज फिर इक बीज हमने बोई भी 

आ गया बूढ़ा ,वही प्याला दिखा 
खुल गयी है उसकी अब रसोई भी 

देखो हिना से तश्वीर कैसी खिल गयी 
कर रहा है उसी से अब दिलजोई भी 

बोलता है पन्ना पन्ना किताब का,
नील आँखें जागती हैं कि सोई भी 

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साफगोई :स्पष्टवादिता
ग़ज़लगोई :ग़ज़ल कहने की प्रक्रिया 
अशरार :शेर का बहुवचन 
दिलजोई: दिलासा देना ,तसल्ली देना ,सान्तवना

मेरी किताब खूबसूरत बेहद हो गयी

इस  तरह  पन्नो  पे  कलम  की  आमद  हो  गयी ,
मेरी  अना  भी  कहीं  जमीन  -ओ -ज़द  हो  गयी  

किसी  ने  पढ़ा  इतना  उसे   दिल -नवाजी  से 
की   मेरी  किताब  खूबसूरत  बेहद  हो  गयी 

फौजी  के  लिए  घर  कहाँ   होता  है  साहिबा
हर  रंग -ओ -बू  खनक  वही   सरहद  हो  गयी

इस  तरह  बेखुदी  ने  खुदा  से  दूर  कर  दिया
की  खुद  को  बदल   देने  की  चाह  अदद  हो  गयी

माफ़  करना  अजीजों  की  इन्सां  परेशान  है
न  जाने  कौन  सी  खलिश  उन्मद्द  हो  गयी

मेरी  माँ  ने  देखा  मुझे  सर -ए -बज़्म  हँसते
गरीब  थी   बहुत  मगर  गद  गद  हो  गयी

"नील"  आ  गयी  नदी  ,कश्ती  को  उतार  दो
सफ़र  के  लिए  जमा  बहुत   रसद  हो   गयी  

भला कौन करता है यकीन आजकल


भला कौन करता है यकीन आजकल
इंसान बन गया है मशीन आजकल

रंजिशें मिटती थी  कभी ईद पर 
क्यूँ लाल हो गयी ज़मीन आजकल 

रिश्ते नाते जल गए किस आग में 
ये  बंदगी भी है संगीन आजकल 

चाँद सिक्कों के लिए सब बिकते हैं
दौलत वाले हैं नाजनीन आजकल 

इस शहर में ये कैसी मुफलिसी है
जो नदिया भी हुई नमकीन आजकल 

मेरी हाल पे लोगों ने दिलासा  दिया
तू तो लिख रहा है बेहतरीन आजकल 

खौफ्फ़ है की कोई अब बोलता नहीं 
क्यूँ  लोग हैं बस तमाशबीन आजकल 


एक मैं और बेगर्ज़ एक कलम मेरा

ज़र्रे ज़र्रे में मेरी रोशनी समाने दो 
ग़म-ए -दुनिया में एक रास्ता बनाने दो 

एक मैं और बेगर्ज़ एक कलम मेरा 
शब-ए-तन्हाई में बैठे हैं दीवाने दो 

परखी जायेगी कश्तियों की बनावट 
अभी लहरों का ज़खीरा तो आने दो 

ज़िन्दगी हर मोड़ पे समझाती है 
उसे खुद ही अब संभल जाने दो

वो यही माँगता रहा लिख कर
ख्वाब काग़ज़ पे बस सजाने दो

मैं गर नहीं तो ये नज़्म ही "नील"
मेरे अजीजों को अपनाने दो

आलस !

लहरों  की आवाजाही हो रही है रेत पर 
ठंडक पहुँच रही है झुलसे हुए तलवों को 

काश! कुछ सीप भी ले आये ,कारोबार सुरू हो जाए !

उदास !!

सूरज  गिर  रहा  है  समुंदर  में ...
आज तारे भी नहीं दिख रहे हैं... 

लगता है, आज चाँद उदास है !