Thursday, December 1, 2016

अपना भी ज़माना होगा अब


है उम्मीदें दामन में ,दर्द का न अब कोई फ़साना होगा
न होगा इतेफाक ही कोई ,न अब कोई बहाना होगा 
इम्तेहान हो कोई भी , तयार हैं हम दिल -ओ -जान से 
मुद्दतों बाद अपना भी ,अब कोई ज़माना होगा !! 


है अजनबी शहर तो क्या ,हर दिल ही अपनी मंजिल है 
भीड़ में खोते नहीं , ऐसे दीवानों की ये महफ़िल है 
है सफ़र पे आज अपने साथ फिर से ख़ुशी 
गुलशन अपने यारों का ,न अब कभी वीराना होगा !!

Tuesday, November 1, 2016

पहचान

कपास को बड़ी अदब से कात रहा है जुलाहा 
उड़  जाता वो  इधर - उधर   बिन पहचान के 

पर  आज उस  शामियाने की पहचान उससे है !!

Wednesday, October 5, 2016

कितने मौसम आते हैँ!

कितने मौसम आते हैँ ,जब पंछी मिलकर गाते हैँ
बादल ज्यूँ उड़ जाता है ,वो चुपके से खो जाते हैँ

खामोशी में धड़कन कब होती हैँ खामोश ,
हर्फ़ों में ,इन ग़ज़लों में अक्सर उनको पाते हैँ

मिलना कब होता है ,है मशरूफ बहुत हर इन्सान
किनसे मिलते हैँ और जाने किनकी बात सुनाते हैँ

रस्ता रस्ता मंजिल मंजिल ,हर महफिल हर कूचे में ,
कितने सपने बुनते हैँ,कितने आह छुपाते हैँ

उखरे उखरे लगते हो ,बिखरे बिखरे लगते हो ,
तुम भी घर  हो आओ  "नील ",हम भी घर से आते हैँ

Tuesday, October 4, 2016

मुकाम की घड़ी






होने को है मुक़ाबिल वो मुकाम की घड़ी  
या कहें कि आखिरी सलाम की घड़ी 

देर तक रहेगी ,स्याही बन के पन्नो पर 
ये नहीं है कोई दौर -ए -जाम की घड़ी 

वक़्त ने चाहा कि मैं बस झील बन जाऊँ ,
हम नदी हैं ,और ये इन्तेक़ाम  की घड़ी  

है इक तरफ शुक्रिया अदायगी अपनी 
है इक तरफ आपके इन्तेज़ाम की घड़ी 

आओ चलें "नील" धूप   के शहर की ओर ,
भायी नहीं हमें सुहानी शाम की घड़ी

Saturday, October 1, 2016

तूफ़ान !!

तूफ़ान से कुछ डालियाँ  टूट गयी हैं
शज़र  अब  भी  वहीँ   है


आज मालिन के बच्चे भूखे नहीं सोयेंगे !



Monday, August 1, 2016

कुछ अधूरे रिश्ते (रेलगाड़ी का सफ़र )

यात्रा जीवन की हो या किसी रेलगाड़ी की, बहुत सारे रिश्तें बंध  जाते हैं  |
रेल के डिब्बे जैसे जुड़े रहते हैं उसी सदृश सहयात्रियों से भावनात्मक रिश्ते बांध जाते हैं कभी -कभी|  
स्टेशन पर खरे खरे जब रेल गाडी में हम प्रस्थान करते हैं और सभी अजनबी एक दुसरे से बातें करने लगते हैं जैसे की पहली बार नहीं बहुत बार  वे साथ रहे हों तो लगता है जीवन कितना सुखद है |अंजानो में होने वाले वार्तालाप को कभी हम अपने बर्थ पर लेते  हुए सुना करते हैं और मंद- मंद मुस्काते रहते हैं क्योंकि थोड़े देर जीवन के दुःख दर्द भुलाकर वो हास्य परिहास करने लगते हैं |


फिर वहीँ कोई मूंगफली वाला आ जाता है | ऐसे तो मना  है रेलगाड़ी में बिना स्वीकृति के मूंगफली बेचना पर भारत के गाँव में पले लोग कब अपना स्वाभाव छोरते हैं | वो  बहुत प्यार से उस मूंगफली वाले से ५- १० रुपये का मूंगफली खरीद लेते हैं और बड़े चाव से खाते हैं जैसे वे कोई बड़े आदमी नहीं ,बस एक आम आदमी हो | पूरी भारतीय पृष्ठभूमि की झलक मिल जाती है तब |कितना अतुलनीय है हमारा देश ये रेलगाड़ी के  छोटे सफ़र में हम  जान जाते हैं | कभी -कभी मैंने देखा की अनजान लोग भी कितने आत्मीय होते हैं | वे सामने खड़े रोते हुए बच्चे को मूंगफली का दाना देकर बोलते हैं-" बेटा इसे खा लो सफ़र बहुत लम्बा है ,माँ को परेशान नहीं करो बेटा ,मैं अगले स्टेशन पर कुछ ले लूँगा खाने के लिए..."| तब मेरा ह्रदय द्रवित हो जाता है ..और सोचने लगता है की ..मेरे गलियों में भी कुछ भूखे बच्चे रहते हैं ...हम भोजन बर्बाद करने समय क्यों नहीं सोचते हैं उनके विषय में?

सफ़र आगे बढ़ता है ...कोई बूढा  आता है अगले स्टेशन पर ..ऊपर वाली बर्थ है उसकी ...और वो असमर्थ है ऊपर जाकर लेटने में....तो कोई नौजवान लड़का झट से खड़ा हो जाता है की बाबा आप नीचे  सो जाइए मैं टिकेट वाले चाचा जी से बोल दूंगा ..आप चिंता नहीं करें.....| तब लगता है मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ की मैंने  ऐसे भारत देश में जन्म लिया है ..और कितनी ममतामयी और पावन है वे माता-पिता जो ऐसे बालक को जनम देते हैं .....|

फिर सुबह जल्दी उठकर मूंह हाथ धोकर खिड़की किनारे बैठ जाता हूँ और बाहर के रमणीय दृश्य देखने लगता हूँ | कभी पर्वत तो कभी कलकल बहती नदी को देख मन आनंदित हो जाता है | फिर कोई पास में बैठे हुए भाई या चाचा मुझे उस स्थल का विवरण देने  लगते हैं ये जानकार की ये मेरा पहला सफ़र है इस प्रदेश के ओर|  .मेरी उत्सुकता जाग जाती है ...और मुझे अपने पिता जी की याद आने लगती है जब वो हमें कहानी सुनाया करते थे और हम रात बिजली गूल होनी पर आई उमस और परेशानी को हँसी ख़ुशी से झेल लिया करते थे | पर   कुछ जगह कल कारखाने से निकलते धुंए और बहता हुआ मैला  पानी मुझे उद्दिग्न कर देते  है .....और फिर सोचता हूँ ....की मेरे बगिये  में लगे फूल न मुरझा गए हों इन पेड़ों की तरह जो कल कारखाने के लगने के बाद काटे जा रहे हैं  अनवरत ...मैं छोर अकेला आया हूँ न उन पौधों को ईश के भरोसे | 

फिर कभी उदास सा मन लगने लगता है तो कई हमउम्र सहयात्री आ जाते  है और फिर अपने विधालय की बात होने लगती है लगता ही नहीं की वो मेरे  साथी नहीं हो ...और जब  भावनाओ में डूबने लगता हूँ और आखिरी स्टेशन के आने की अधीरता को भूल थोडा और वक़्त बिताना चाहता हूँ उन सहयात्रियों के साथ ..जो कुछ समय में ही अपने से लगने लगते हैं ...तभी मन को अवांछित सी उद्घोषणा होती है की दादर स्टेशन आने वाली है ...और कुछ दर्द और कुछ प्रसन्नता के मिश्रित भावों के सहित रेलगाड़ी का सफ़र समाप्त हो जाता है....पीछे छूट जाते हैं बस ....कुछ अधूरे रिश्ते...और कुछ लम्हे ...सब फिर उम्मीदों की नज़रों से एक दुसरे को भावमयी विदाई देकर ज़िन्दगी के सफ़र पर निकल जाते हैं ........सच में रेलगाड़ी का सफ़र एक अनूठा रिश्ता बना देता है अंजानो में .....|

Friday, July 1, 2016

गुनाह

बेआवाज है ,बेचेहरा भी है
नज़रों पर अपने पहरा भी है

एक  भी पत्थर तो दीखते नहीं ,
कहने को ज़ख्म गहरा भी है

ये तो गीतों पर है गुनाह
वो गाता भी है ,बहरा भी है

"नील" गगन सर पर है अगर
हल्का सुनहरा सहरा भी है

Tuesday, June 14, 2016

धनुक

आये धनुक जाने पर ,ऎसे बरस के देख
इक बार बदरे की तरह से तरस के देख

मत पूछ कि पत्ते बहुत ही बेआवाज़ हैँ ,
रुक जा कहीं और फिर जलवे नफस के देख

देखना अंदाज़ ओ अदा फिर और फैसला
उससे ज़रा पहले मुद्दे बहस के देख

Friday, June 10, 2016

समर

सूख रही है ज़मीं ,और शज़र हो जाये
और भी ख्वाईश  ,हासिल घर हो जाये

मुझसे बेहतर जान लेते ,मुझसे ही सुनकर
मैं भी हो जाता नया सा ,ये खबर हो जाये

जाने किस आवाज से वो हो जाएगा ख़ामोश ,
जाने किस एहसास से वो नामाबर हो जाये

आपको मालूम है हर पल है खुद से जंग ,
फिर भी तसल्ली को खुद में समर हो जाये

Tuesday, June 7, 2016

तश्वीर

इक रँग का इख्तियार ,इक रँग का गुरूर
कल जाने वो तश्वीर रास आये ,न आये

तश्वीर सौंपता है साहिल के रेत को
सोचे है ये कि लहर पास आये न आये

Monday, June 6, 2016

मधुशाला


दूर  क्षितिज  पर  उगता सूरज ,दिखा  रहा अपना ज्वाला
पाने  की  कोशिश  में  सबने  ,जीवन  कैसे  बीता  डाला
ह्रदय  की  धुन को सुन  ले  राही ,सुबक -सुबक  के आस न कर
तू  ही  खुद का है रक्षक  ,अब  समझाती  ये  मधुशाला 

Saturday, May 21, 2016

ये सवेरा रहे

जो है तेरा वो तेरा रहे ,ये सवेरा रहे
शायद ,जब तक इस जिंदगी का फेरा रहे

जैसे की कोई इम्तेहाँ हो और इनको पढ़े
साँसों के मानिंद हर्फों का भी बसेरा रहे

शायद सूरज जलाता भी है ,या हो उसे रंज
कुछ रोज से ये बादल घर को घेरा रहे

कुछ भी कहे तो लगता है कि है अजनबी,
"नील "कहे तो हम भी कहें ,वो मेरा रहे

Sunday, May 15, 2016

मुन्तज़िर

रास्ता आवाज दे  ,और है वो मंजिल ,मुन्तज़िर ,
किस तरह लहर का होता है साहिल मुन्तज़िर

अब शज़र से बात कर ले पंछी भूल आसमान
एक  एक पत्तों के दामन में शामिल मुन्तज़िर

हर तरफ मेला लगा है ,है बहुत सब आस में ,
याँ वो ज़ाहिल मुन्तज़िर वहाँ वो फाजिल मुन्तज़िर

ये कीसी ने सच कहा था शायद हो गयी इक सदी
हर जगह तेरे लिए है तेरा हासिल मुन्तज़िर

Thursday, May 12, 2016

बाग लगा दो

शोर किया पंछी ने ,तो दाना क्यों ले आये
बाग लगा दो  दाना तिनका चुग लेंगे ,चुन लेंगे 

नींद के मारे हैँ सारे,न जाकर  उन्हें उठायें
जिस रोज़ खुद जागेंगे ,ख्वाब वहीं बुन लेंगे 

हम न बोले तो कैसे, होगा फिर बात नुमाया
और यही सच है कि आप तो बस सुन लेंगे

सुकून


तुम अगर दिल कहोगे, तो बहुत झूठे हो तुम ,
कब हमें मन कहोगे , कब तलक  रूठे हो तुम

शाम हो गयी है तो ,दीपक जला लो आप ही ,
साया भी मिल जायेगा ,आस  में बैठे हो तुम

जो था मन में समंदर ,हो के बाहर बूँद है
और पूछे बूँद ही कि यार अब कैसे हो तुम

बस यही लम्हा तो दोनों  को बराबर कर रहा
किस तरह  पाया  था मैं,किस तरह खोते हो तुम 

ख्वाब में देखा कि आया था लिये एक फैसला
मानने ख़्वाबों में आऊं ,किस जगह सोते हो तुम

मैं सफ़र से किस तरह बाहर करूँ दो बात को,
हर जगह  होता हूँ मैं,हर जगह होते  हो तुम

मैं गवाही में तुम्हारे  मन का  टुकरा लाऊँगा
क़्योंकि झूठा था मैं तब ,क्योंकि अब झूठे हो तुम


है सुकून  "नील" को ,है दोस्त वो मेरा बड़ा
इक जगह हँसता हूँ मैं,इक जगह हँसते हो तुम

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Wednesday, May 11, 2016

सीपी

हरी घास हूँ तेरी आस हूँ
ज़रा ज़रा सा तेरे पास हूँ

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 दूर था खुद से अभी भी दूर हूँ
आप सुनिए,खुद को नामंज़ूर हूँ

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एक सीपी में कहानी गढ़ गयी है दोस्तों
कोई लूटेरा आये तो मोती की कीमत लगे

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अब दूर खड़ा है  साहिल पर ,लहरों की कहानी  बतलाये
ये दिल तो तब  ही मानेगा ,जो पानी में डूबा आये 

जो बात वक्त से ऊपर  है ,उससे ही अहमक होता है
उससे ही उम्मीदें हैँ,उससे ही घबराये


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दीवान या चूल्हा रहे ,देखिये, काग़ज़ का  रंग
इनके शुक्रिया का ढंग,इनके ही  गरज का  रंग 

होगयी जायज़ शगल का जोर चलता ही रहा  ,
ईमान  बन गया ऎसे वक्त -ऐ -नाजायज का रंग


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मानी

बादल  बरसेंगे  ,समन्दर  ! ,पानी  तुम  सम्भालो,
नज़्म   कोरी  है  मुरीदों  ,मानी  तुम  सम्भालो

खुद में सिमट जाओ या रवानी तुम सम्भालो ,
ये धूप छाँव की मेहेरबानी तुम सम्भालो 

खुद को है जो हासिल  क्यूँ दिखा रहा था वो ,
हासील हो गया है, जो बेमानी ,तुम सम्भालो 

आसमां का रंग अब ,देता है  ये हौसला
खुद को परखने की ये निशानी ,तुम सम्भालो

Tuesday, May 10, 2016

रुक गया

हम कि कुछ कहना भी चाहें ,हैँ ये अशरार जो
लड़खड़ाती बात पर इनका ,यूँ होना भी हो 

ख़ैर  कुछ बदला नहीं ,कि नींद से उठ जाएँ अब ,
एक कागज़ ही सरिका कोई बिछौना भी  हो

रुक गया देर तक मैं किस सुखनवर के यहाँ ,
उसको फ़िक्र-ऐ -कद नहीं ,कद मेरा बौना भी  हो 

लिख रहे हैँ अदा में  ,कि बस मासूमियत
के लिए कोई नया चारा  और खिलौना भी  हो 

एक  छिटकते पुराने ईंट ने किया बयाँ ,
दिवार के रँग से हि गर है वास्ता होना ,भी हो

एक उम्दा शेर

कैद से आज़ाद कर के यूँ हवा ले आयेगा !
वक़्त का घोड़ा पता तूफ़ान का ले आयेगा !

है सिकंदर शेर  फिलवक्त ,इसको कट जाने तो दें ,
पर्वतों में रास्ता ,खुद फासला ले आयेगा.

फिर उसी रंग में न देखा किया उस शेर को
एक उम्दा शेर अब  क़्या वो दवा ले आएगा ?

आप इतने  ना अदब लाएं ,कि  ये शेर
इक तसल्ली को  रंग दूसरा ले  लाएगा.

है बहुत ठण्डी सी सीरत ,एक  माटी का घड़ा
इम्तेहाँ होगी जो पानी, खौलता ले आयेगा!

पूछते हैँ  बस ,कि उनका शौक़ भी पूरा करें,
एक काफिर किस तरह उनका खुदा ले आएगा ?

गुम  रहा   तो गुज़रा   लम्हा पूछता    है सवाल ,
क्या ये शेर नक्श ,उस  "नील" का ले आएगा  !?

Sunday, May 8, 2016

एक  ही लम्हा

बुलबुला पानी का दिखा रहा था वो ,
ऎसे मेरा बोझ उठा रहा था वो

भूलना भी इत्तेफ़ाक़ नहीं है जी ,
ईद का चाँद यूँ  ,बता रहा था वो

वो मिला ,जान कर कि कैसे मिलना है
फिर भरम का ही पता,बता रहा था वो

एक  ही लम्हा मगर घर को जा रहा था मैं ,
एक ही मंजिल लिए घर से आ रहा था वो

कल तो ऐसा था कि बराबर लगता था ,
आज पर्वत सा नज़र ,आ रहा था वो

एक शायर न तो बहरा है न तो गूंगा है ,
फिर से इक नज़्म ही ,सुना रहा था वो

या तो लब से नहीं कह सकता "नील "
या तो आँखों में कुछ ,छुपा रहा था वो

Saturday, May 7, 2016

चुपचाप


कह रहे हैँ हर घड़ी हम आपसे गज़ल ,
हम ही चुप हैँ या हैँ चुपचाप से गज़ल

है दश्त के  सफर या मिलाप से गज़ल ,
हम साज बन गये ,हैँ आलाप  से गज़ल

हो जाए मायूस सा बाजार में हर शख्स ,
खुश हैँ कि मिलते नहीं हैं नाप से गज़ल

है तमाशाई हर शायर ,हर महफिल ,
देखें हैँ नजदीक से ,माँ बाप से गज़ल

मेरी ये नज़्म


हैं पूछते सवाल, पर जवाब नहीं हो !
आसमाँ तो चाहिए ,आफताब नहीं हो ?

ये कोयल की कूकें,और बया की काविश
क्यों हमें भी  ए  खुदा, पायाब नहीं हो

जल जाती है फानूस सी मेरी ये नज़्म ,
जो "नील लिख" दूँ,खराब नहीं हो !


Friday, May 6, 2016

भरम

न कीजिये ,खुले हुए किताब का भरम ?
आपको रोके है किस शराब का भरम !

है आपको क्यूँ न पता सुदो -जियाँ अपनी ,
है आपको किसी कामयाब का भरम !

है शाख को दोनों ही अजीज है ये करिश्मा ,
काँटो से रंजिशें हैँ ,न गुलाब का भरम .

चुपचाप रह जाते  हैँ  सवालों पे कभी तो ,
ये जानिये है उन्हें जवाब का भरम

Thursday, May 5, 2016

ग़ज़ल

सहरा की तपिश में हरे जंगल क्यूँ लौटे
बरसात की ख्वाहिश न थी ,बादल क्यूँ लौटे

पूछा नहीं की बिना ग़ज़ल क्यूँ लौटे ,
लकिन बाज़ार से बिना चावल क्यूँ लौटे

शहरों में आ रही है लहर कितने वाइजों की ,
न गिनिए की गाँव में कई पागल क्यूँ लौटे

जाते हैँ आप किस तरह,आते हैँ फिर कैसे
घुड़सवार थे भले मगर पैदल क्यूँ लौटे

Wednesday, May 4, 2016

बेचेहरा

है सामने मेरा चेहरा और बात क्या हो ,
सागर से भी गहरा ,और बात क्या हो

भारी है जैसे हो कोई चट्टान सा ,
तेरा दिया सेहरा ,और बात क्या हो

किसको न समझा और किस को समझाये ,
खुद हो गया बहरा ,और बात क्या हो

है इस तरह एक  बार फिर दरवाज़े पे
इक उम्र का पहरा ,और बात क्या हो

खुद को मिला रहा था ,पर खुदा नहीं
कुछ देर ही ठहरा ,और बात क्या हो

है शाम ही ,कहता है सूरज चाँद से ,
अब मैं गया तू आ ,और बात क्या हो

अब चाहता है क्यूँ भला , ये "नील " भी ,
हो जाये बेचेहरा ,और बात क्या हो

Tuesday, May 3, 2016

बस एक किनारा

हर बात ही उनको एक लगे ,बस एक किनारा ताक रहे ,
जब खुद भी सफर कर लौट हैँ ,क्यूँ हैराँ  हैँ  आवाक रहे

आईना लेकर जब बैठूं ,खुद में और उलझ जाऊँ ,
कोई बेखुद हो जाए,दूर रहे और पाक रहे

चेहरे से ज़ाहिर हो जाए तो फिर न होगी देर कभी ,
ये स्याही मेरी खुराक रहे ,आपकी भी नाक रहे

Sunday, May 1, 2016

मुंसिफ

ये है ज़रूरी  आप में कोई अदा भी हो ,
पर भूल जाना कि कोई फायदा भी हो

ये ज़मीं के अजूबे , लगते हैँ कभी छोटे
चाँद और सूरज सा  कोई फासला भी हो ,

मैं  बुरा हूँ ,मानता भी हूँ ,मेरे मुंसिफ
मेरे लिए कोई  मुस्सल्लम सज़ा भी हो

हमने दिया है कहाँ,लेकर गये कोई ,
ख्वाईश है कि उनमे मेरा खुदा भी हो

खामोशियाँ मेरी रगों में है कहाँ नयी ,
लेकिन नहीं चुप हूँ ,कि कोई जानता भी हो

हमको ना यूँ समझो कि ,वो क्यूँ रँग गया मुझमे
चेहरा अगर होगा तो कोई ,आईना भी हो

ये चीज़ क्या कम है कि ये आवाज़ गूँजेगी
जब "नील " ना होगा क़ोई आपसा भी हो

Monday, April 25, 2016

आईना

एक  सा नहीं दिखता चेहरा हर आईने में
पाया है रंग और भी गहरा हर आईने में

रोको नहीं सफर कि सहरा बहुत बड़ा है ,
देखा किया बहुत है ,पहरा हर आईने में

वो  टुकड़ा तुम्हारे दर्श में ही,होगा कहीं छुपा
नादाँ हो ढूंढते हो वही टुकड़ा  हर आईने में

Sunday, April 10, 2016

ए ज़िन्दगी!

ए ज़िन्दगी तुझे देख कर आवाक रह गए,
उम्मीद ,ऐतवार , बस पोशाक रह गये

जो आफताब था वो दहकता रहा,
जो चराग़ थे ,वो यहाँ खाक रह गये

जब  क़ोई संजीदगी ढूँढ़ने चले,
हर मोड़ पे जाने क्या मज़ाक रह  गये

कूचे से तेरी जिंदगी लौटे सादा दिल,
खातिर में तेरे तेज़ और  चालाक रह गये

हाँ जोर तोड़ सब रहे तुझको मनाने को ,
ताक पर लेकिन यहाँ इख़लाक़ रह गये

Sunday, March 27, 2016

खामोश

वो तो सुनता है मगर  ,खामोश रह जाता है
इम्तेहान -ऐ -ज़ीस्त में कब होश रह जाता है ?

कोई हुजूम आया नहीं ,अब कर रहे क्यों गिला
अप खुद से न मिले,क्या  दोष रह जाता है ?

किस तरह से ज़मीं ठण्ड से बातें करे
और गवाह में किस तरह बस ओस रह जाता है !

Saturday, March 12, 2016

किस बात का चर्चा



काग़ज़ में रात एक फिर बिता जवाब का 
किस बात का चर्चा था महँगे किताब का

हर रंग से वाक़िफ़ नहीं ए ज़िन्दगी तेरी !
है खूं   का रंग लाल या  फिर गुलाब का ?

हमें आपके होश का क्यों इंतजार है ! ?
थामे हैं आप आज भी दामन शराब का 

करता  भी वो यकीन तो किस बिनाह पर 
पहने थे सब नक़ाब किसी बेनक़ाब का


अब के ना तुझको छाँव की होगी तलाश "नील"
लाये हैं  अब के साया उस आफ़ताब का


Sunday, March 6, 2016

उजाला

अंधेरों में उजाला ढूंढते हो
बहुत प्यासे हो ,प्याला ढूँढ़ते हो

ये सहरा है मगर खुशफ़हम हो
यहाँ आकर निवाला ढूँढ़ते हो

तुम बागवाँ का हाल देखो
सुर्ख फूलों की माला ढूँढ़ते हो

शहर भर की रंगीनियत में
कोई गाँव वाला ढूँढ़ते हो

"नील " कल ढूँढ़ते थे सुरा को ,
क्या आलम है ,हाला ढूँढ़ते हो

Sunday, February 28, 2016

मुसाफ़िर

ईधर  जाऊँ , उधर जाऊं ,कहो कैसा सफर कर लूँ 
कई तो हैं तमाशे अब ,कहो कैसी नज़र कर   लूँ 

मुझे मिट्टी  ही प्यारी है,भले मैं   हूँ तेरा मज़दूर 
कहो  क्यों ए ज़मीं वाले , खुद को बेहुनर  कर लूँ 

मैं खामोश रह लूँगा ,फिर भी साँस  जब  लोगे
न तब भूल  पाओगे   ,खुद को जो शज़र  कर लूँ 

 मुझे मालूम है फिर आसमाँ का  रंग क्या होगा 
 परिंदा  हूँ,भरोषा पँख पर खुद के, अगर कर लूँ

कल, सूरज  !, न  जाने कौन सी ,धूप लाये "नील"
मुसाफ़िर हूँ ,हर रास्ते  को हमसफ़र कर कर लूँ

Saturday, February 27, 2016

हमें चलना था

जो ठीक लगता है कह देते हो 
जैसे शतरंज हो ,और शह देते हो 

क्यों छीन लेते हो तुम रात को 
जब रोशनी  तुम सुबह देते हो 

हमें चलना था ,हम चलते रहे 
तुम पथरीली सतह देते हो 

मैं   भूल जाऊँ ,तुम्हे परवाह नहीं
पर याद रखने की वजह देते हो

Monday, February 1, 2016

रात आयी है !


रात  आयी  है   ,
चाँद  भी  सो  गया  है  ,
बादल  को  ओढ़  कर.. 


चलो  ,सूरज  की  लाली  को  देखने  ,
ख्वाब  में  खो  जाते  हैं...


कल  खिड़की  के  शीशे   पर  पड़ी  ओस  की  बूँदें  को  
जब  सूरज  की  किरणे   छू  जायेंगी  
तो    हमारे   पास   भी  
बेमोल    मोतियों   का   खजाना   होगा..  


और    जब  बादलों  रोयेंगे  
अपने    चाँद  से    बिछड़ने   वक़्त   कल   सुबह  
तब  
उस  प्रेम  भरी  बारिश  में  तुम  बागीचे  में  नहा  लेना .....


और  दिन  की  शुरुआत  करना  .....

कलाकार


कलाकार  मरा  नहीं  करते  ,वो  जिंदा  करते  हैं  हर पल हमारा  वजूद
उनके  नगमे ,अंदाज़ , कुछ  गीत  ,कुछ  साज़  ,रहते  हैं  हरदम  मौजूद !!

जीते हैं अपने जिद्द में और छोर चले जाते हैं  राहों पर अपनी निशानियाँ 
चलते हैं बेख़ौफ़ कितने ही कारवां ,मिलती है कितनो को मनमाफिक दुनिया !!

मीठे नींद को ठुकरा वो जागते हैं सुनी रातों में भी रौशन करने हमारे दिल को 
हम जलाया करते हैं चिराग उन्ही के बनाये के रौशन करने अपने महफ़िल को !!

वो खुदा नहीं  हो पर खुदा की ओर जाने वाली राह  दिखा  ही देते हैं 
एक काफिर  इंसान को भी वो मेहरबान उस  खुदा का बना  ही देते हैं !!

आज ये चंद लफ्ज़ उन्ही के नाम  अपने कलम से लिख देता हूँ 
आज उनके एहसान मुझपे भी हैं उन्हें दिल-ओ -जान से कह देता हूँ !!

Friday, January 1, 2016

शाख   के बिखरे पत्तों के नीचे जो सुखी ज़मीन है,
 वो छुप गयी है 
पर सब को पता है की अकाल आया था अबकी  मौसम ......

समेट लो इन पत्तों को माली ...
घर पर चूल्हा आज की रात तो जल ही जाएगा .....
ये शाख तो हर मौसम साथ निभायेंगे .........

पूछना  उस चौधरी से जो तुम्हारे गाँव में नयी नयी चिमनिया लगवा रहा है .....
अब जब हरे भरे जंगल कंक्रीट के काले महलों में तब्दील होंगे तो फाका करना होगा न...तुम्हे ही....
उनकी रसद आ जायेगी परदेश से ....

एक वृक्ष अपने जन्मदिन पर ज़रूर लगाएं हम सब ....