Wednesday, May 4, 2016

बेचेहरा

है सामने मेरा चेहरा और बात क्या हो ,
सागर से भी गहरा ,और बात क्या हो

भारी है जैसे हो कोई चट्टान सा ,
तेरा दिया सेहरा ,और बात क्या हो

किसको न समझा और किस को समझाये ,
खुद हो गया बहरा ,और बात क्या हो

है इस तरह एक  बार फिर दरवाज़े पे
इक उम्र का पहरा ,और बात क्या हो

खुद को मिला रहा था ,पर खुदा नहीं
कुछ देर ही ठहरा ,और बात क्या हो

है शाम ही ,कहता है सूरज चाँद से ,
अब मैं गया तू आ ,और बात क्या हो

अब चाहता है क्यूँ भला , ये "नील " भी ,
हो जाये बेचेहरा ,और बात क्या हो

3 comments:

  1. आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 06/05/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
    अंक 294 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

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