Monday, June 6, 2016

मधुशाला


दूर  क्षितिज  पर  उगता सूरज ,दिखा  रहा अपना ज्वाला
पाने  की  कोशिश  में  सबने  ,जीवन  कैसे  बीता  डाला
ह्रदय  की  धुन को सुन  ले  राही ,सुबक -सुबक  के आस न कर
तू  ही  खुद का है रक्षक  ,अब  समझाती  ये  मधुशाला 

2 comments:

  1. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 07/06/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...