Sunday, March 27, 2016

खामोश

वो तो सुनता है मगर  ,खामोश रह जाता है
इम्तेहान -ऐ -ज़ीस्त में कब होश रह जाता है ?

कोई हुजूम आया नहीं ,अब कर रहे क्यों गिला
अप खुद से न मिले,क्या  दोष रह जाता है ?

किस तरह से ज़मीं ठण्ड से बातें करे
और गवाह में किस तरह बस ओस रह जाता है !

Saturday, March 12, 2016

किस बात का चर्चा



काग़ज़ में रात एक फिर बिता जवाब का 
किस बात का चर्चा था महँगे किताब का

हर रंग से वाक़िफ़ नहीं ए ज़िन्दगी तेरी !
है खूं   का रंग लाल या  फिर गुलाब का ?

हमें आपके होश का क्यों इंतजार है ! ?
थामे हैं आप आज भी दामन शराब का 

करता  भी वो यकीन तो किस बिनाह पर 
पहने थे सब नक़ाब किसी बेनक़ाब का


अब के ना तुझको छाँव की होगी तलाश "नील"
लाये हैं  अब के साया उस आफ़ताब का


Sunday, March 6, 2016

उजाला

अंधेरों में उजाला ढूंढते हो
बहुत प्यासे हो ,प्याला ढूँढ़ते हो

ये सहरा है मगर खुशफ़हम हो
यहाँ आकर निवाला ढूँढ़ते हो

तुम बागवाँ का हाल देखो
सुर्ख फूलों की माला ढूँढ़ते हो

शहर भर की रंगीनियत में
कोई गाँव वाला ढूँढ़ते हो

"नील " कल ढूँढ़ते थे सुरा को ,
क्या आलम है ,हाला ढूँढ़ते हो

Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...