Saturday, May 21, 2016

ये सवेरा रहे

जो है तेरा वो तेरा रहे ,ये सवेरा रहे
शायद ,जब तक इस जिंदगी का फेरा रहे

जैसे की कोई इम्तेहाँ हो और इनको पढ़े
साँसों के मानिंद हर्फों का भी बसेरा रहे

शायद सूरज जलाता भी है ,या हो उसे रंज
कुछ रोज से ये बादल घर को घेरा रहे

कुछ भी कहे तो लगता है कि है अजनबी,
"नील "कहे तो हम भी कहें ,वो मेरा रहे

Sunday, May 15, 2016

मुन्तज़िर

रास्ता आवाज दे  ,और है वो मंजिल ,मुन्तज़िर ,
किस तरह लहर का होता है साहिल मुन्तज़िर

अब शज़र से बात कर ले पंछी भूल आसमान
एक  एक पत्तों के दामन में शामिल मुन्तज़िर

हर तरफ मेला लगा है ,है बहुत सब आस में ,
याँ वो ज़ाहिल मुन्तज़िर वहाँ वो फाजिल मुन्तज़िर

ये कीसी ने सच कहा था शायद हो गयी इक सदी
हर जगह तेरे लिए है तेरा हासिल मुन्तज़िर

Thursday, May 12, 2016

बाग लगा दो

शोर किया पंछी ने ,तो दाना क्यों ले आये
बाग लगा दो  दाना तिनका चुग लेंगे ,चुन लेंगे 

नींद के मारे हैँ सारे,न जाकर  उन्हें उठायें
जिस रोज़ खुद जागेंगे ,ख्वाब वहीं बुन लेंगे 

हम न बोले तो कैसे, होगा फिर बात नुमाया
और यही सच है कि आप तो बस सुन लेंगे

सुकून


तुम अगर दिल कहोगे, तो बहुत झूठे हो तुम ,
कब हमें मन कहोगे , कब तलक  रूठे हो तुम

शाम हो गयी है तो ,दीपक जला लो आप ही ,
साया भी मिल जायेगा ,आस  में बैठे हो तुम

जो था मन में समंदर ,हो के बाहर बूँद है
और पूछे बूँद ही कि यार अब कैसे हो तुम

बस यही लम्हा तो दोनों  को बराबर कर रहा
किस तरह  पाया  था मैं,किस तरह खोते हो तुम 

ख्वाब में देखा कि आया था लिये एक फैसला
मानने ख़्वाबों में आऊं ,किस जगह सोते हो तुम

मैं सफ़र से किस तरह बाहर करूँ दो बात को,
हर जगह  होता हूँ मैं,हर जगह होते  हो तुम

मैं गवाही में तुम्हारे  मन का  टुकरा लाऊँगा
क़्योंकि झूठा था मैं तब ,क्योंकि अब झूठे हो तुम


है सुकून  "नील" को ,है दोस्त वो मेरा बड़ा
इक जगह हँसता हूँ मैं,इक जगह हँसते हो तुम

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Wednesday, May 11, 2016

सीपी

हरी घास हूँ तेरी आस हूँ
ज़रा ज़रा सा तेरे पास हूँ

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 दूर था खुद से अभी भी दूर हूँ
आप सुनिए,खुद को नामंज़ूर हूँ

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एक सीपी में कहानी गढ़ गयी है दोस्तों
कोई लूटेरा आये तो मोती की कीमत लगे

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अब दूर खड़ा है  साहिल पर ,लहरों की कहानी  बतलाये
ये दिल तो तब  ही मानेगा ,जो पानी में डूबा आये 

जो बात वक्त से ऊपर  है ,उससे ही अहमक होता है
उससे ही उम्मीदें हैँ,उससे ही घबराये


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दीवान या चूल्हा रहे ,देखिये, काग़ज़ का  रंग
इनके शुक्रिया का ढंग,इनके ही  गरज का  रंग 

होगयी जायज़ शगल का जोर चलता ही रहा  ,
ईमान  बन गया ऎसे वक्त -ऐ -नाजायज का रंग


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मानी

बादल  बरसेंगे  ,समन्दर  ! ,पानी  तुम  सम्भालो,
नज़्म   कोरी  है  मुरीदों  ,मानी  तुम  सम्भालो

खुद में सिमट जाओ या रवानी तुम सम्भालो ,
ये धूप छाँव की मेहेरबानी तुम सम्भालो 

खुद को है जो हासिल  क्यूँ दिखा रहा था वो ,
हासील हो गया है, जो बेमानी ,तुम सम्भालो 

आसमां का रंग अब ,देता है  ये हौसला
खुद को परखने की ये निशानी ,तुम सम्भालो

Tuesday, May 10, 2016

रुक गया

हम कि कुछ कहना भी चाहें ,हैँ ये अशरार जो
लड़खड़ाती बात पर इनका ,यूँ होना भी हो 

ख़ैर  कुछ बदला नहीं ,कि नींद से उठ जाएँ अब ,
एक कागज़ ही सरिका कोई बिछौना भी  हो

रुक गया देर तक मैं किस सुखनवर के यहाँ ,
उसको फ़िक्र-ऐ -कद नहीं ,कद मेरा बौना भी  हो 

लिख रहे हैँ अदा में  ,कि बस मासूमियत
के लिए कोई नया चारा  और खिलौना भी  हो 

एक  छिटकते पुराने ईंट ने किया बयाँ ,
दिवार के रँग से हि गर है वास्ता होना ,भी हो

एक उम्दा शेर

कैद से आज़ाद कर के यूँ हवा ले आयेगा !
वक़्त का घोड़ा पता तूफ़ान का ले आयेगा !

है सिकंदर शेर  फिलवक्त ,इसको कट जाने तो दें ,
पर्वतों में रास्ता ,खुद फासला ले आयेगा.

फिर उसी रंग में न देखा किया उस शेर को
एक उम्दा शेर अब  क़्या वो दवा ले आएगा ?

आप इतने  ना अदब लाएं ,कि  ये शेर
इक तसल्ली को  रंग दूसरा ले  लाएगा.

है बहुत ठण्डी सी सीरत ,एक  माटी का घड़ा
इम्तेहाँ होगी जो पानी, खौलता ले आयेगा!

पूछते हैँ  बस ,कि उनका शौक़ भी पूरा करें,
एक काफिर किस तरह उनका खुदा ले आएगा ?

गुम  रहा   तो गुज़रा   लम्हा पूछता    है सवाल ,
क्या ये शेर नक्श ,उस  "नील" का ले आएगा  !?

Sunday, May 8, 2016

एक  ही लम्हा

बुलबुला पानी का दिखा रहा था वो ,
ऎसे मेरा बोझ उठा रहा था वो

भूलना भी इत्तेफ़ाक़ नहीं है जी ,
ईद का चाँद यूँ  ,बता रहा था वो

वो मिला ,जान कर कि कैसे मिलना है
फिर भरम का ही पता,बता रहा था वो

एक  ही लम्हा मगर घर को जा रहा था मैं ,
एक ही मंजिल लिए घर से आ रहा था वो

कल तो ऐसा था कि बराबर लगता था ,
आज पर्वत सा नज़र ,आ रहा था वो

एक शायर न तो बहरा है न तो गूंगा है ,
फिर से इक नज़्म ही ,सुना रहा था वो

या तो लब से नहीं कह सकता "नील "
या तो आँखों में कुछ ,छुपा रहा था वो

Saturday, May 7, 2016

चुपचाप


कह रहे हैँ हर घड़ी हम आपसे गज़ल ,
हम ही चुप हैँ या हैँ चुपचाप से गज़ल

है दश्त के  सफर या मिलाप से गज़ल ,
हम साज बन गये ,हैँ आलाप  से गज़ल

हो जाए मायूस सा बाजार में हर शख्स ,
खुश हैँ कि मिलते नहीं हैं नाप से गज़ल

है तमाशाई हर शायर ,हर महफिल ,
देखें हैँ नजदीक से ,माँ बाप से गज़ल

मेरी ये नज़्म


हैं पूछते सवाल, पर जवाब नहीं हो !
आसमाँ तो चाहिए ,आफताब नहीं हो ?

ये कोयल की कूकें,और बया की काविश
क्यों हमें भी  ए  खुदा, पायाब नहीं हो

जल जाती है फानूस सी मेरी ये नज़्म ,
जो "नील लिख" दूँ,खराब नहीं हो !


Friday, May 6, 2016

भरम

न कीजिये ,खुले हुए किताब का भरम ?
आपको रोके है किस शराब का भरम !

है आपको क्यूँ न पता सुदो -जियाँ अपनी ,
है आपको किसी कामयाब का भरम !

है शाख को दोनों ही अजीज है ये करिश्मा ,
काँटो से रंजिशें हैँ ,न गुलाब का भरम .

चुपचाप रह जाते  हैँ  सवालों पे कभी तो ,
ये जानिये है उन्हें जवाब का भरम

Thursday, May 5, 2016

ग़ज़ल

सहरा की तपिश में हरे जंगल क्यूँ लौटे
बरसात की ख्वाहिश न थी ,बादल क्यूँ लौटे

पूछा नहीं की बिना ग़ज़ल क्यूँ लौटे ,
लकिन बाज़ार से बिना चावल क्यूँ लौटे

शहरों में आ रही है लहर कितने वाइजों की ,
न गिनिए की गाँव में कई पागल क्यूँ लौटे

जाते हैँ आप किस तरह,आते हैँ फिर कैसे
घुड़सवार थे भले मगर पैदल क्यूँ लौटे

Wednesday, May 4, 2016

बेचेहरा

है सामने मेरा चेहरा और बात क्या हो ,
सागर से भी गहरा ,और बात क्या हो

भारी है जैसे हो कोई चट्टान सा ,
तेरा दिया सेहरा ,और बात क्या हो

किसको न समझा और किस को समझाये ,
खुद हो गया बहरा ,और बात क्या हो

है इस तरह एक  बार फिर दरवाज़े पे
इक उम्र का पहरा ,और बात क्या हो

खुद को मिला रहा था ,पर खुदा नहीं
कुछ देर ही ठहरा ,और बात क्या हो

है शाम ही ,कहता है सूरज चाँद से ,
अब मैं गया तू आ ,और बात क्या हो

अब चाहता है क्यूँ भला , ये "नील " भी ,
हो जाये बेचेहरा ,और बात क्या हो

Tuesday, May 3, 2016

बस एक किनारा

हर बात ही उनको एक लगे ,बस एक किनारा ताक रहे ,
जब खुद भी सफर कर लौट हैँ ,क्यूँ हैराँ  हैँ  आवाक रहे

आईना लेकर जब बैठूं ,खुद में और उलझ जाऊँ ,
कोई बेखुद हो जाए,दूर रहे और पाक रहे

चेहरे से ज़ाहिर हो जाए तो फिर न होगी देर कभी ,
ये स्याही मेरी खुराक रहे ,आपकी भी नाक रहे

Sunday, May 1, 2016

मुंसिफ

ये है ज़रूरी  आप में कोई अदा भी हो ,
पर भूल जाना कि कोई फायदा भी हो

ये ज़मीं के अजूबे , लगते हैँ कभी छोटे
चाँद और सूरज सा  कोई फासला भी हो ,

मैं  बुरा हूँ ,मानता भी हूँ ,मेरे मुंसिफ
मेरे लिए कोई  मुस्सल्लम सज़ा भी हो

हमने दिया है कहाँ,लेकर गये कोई ,
ख्वाईश है कि उनमे मेरा खुदा भी हो

खामोशियाँ मेरी रगों में है कहाँ नयी ,
लेकिन नहीं चुप हूँ ,कि कोई जानता भी हो

हमको ना यूँ समझो कि ,वो क्यूँ रँग गया मुझमे
चेहरा अगर होगा तो कोई ,आईना भी हो

ये चीज़ क्या कम है कि ये आवाज़ गूँजेगी
जब "नील " ना होगा क़ोई आपसा भी हो