Wednesday, October 5, 2016

कितने मौसम आते हैँ!

कितने मौसम आते हैँ ,जब पंछी मिलकर गाते हैँ
बादल ज्यूँ उड़ जाता है ,वो चुपके से खो जाते हैँ

खामोशी में धड़कन कब होती हैँ खामोश ,
हर्फ़ों में ,इन ग़ज़लों में अक्सर उनको पाते हैँ

मिलना कब होता है ,है मशरूफ बहुत हर इन्सान
किनसे मिलते हैँ और जाने किनकी बात सुनाते हैँ

रस्ता रस्ता मंजिल मंजिल ,हर महफिल हर कूचे में ,
कितने सपने बुनते हैँ,कितने आह छुपाते हैँ

उखरे उखरे लगते हो ,बिखरे बिखरे लगते हो ,
तुम भी घर  हो आओ  "नील ",हम भी घर से आते हैँ

Tuesday, October 4, 2016

मुकाम की घड़ी






होने को है मुक़ाबिल वो मुकाम की घड़ी  
या कहें कि आखिरी सलाम की घड़ी 

देर तक रहेगी ,स्याही बन के पन्नो पर 
ये नहीं है कोई दौर -ए -जाम की घड़ी 

वक़्त ने चाहा कि मैं बस झील बन जाऊँ ,
हम नदी हैं ,और ये इन्तेक़ाम  की घड़ी  

है इक तरफ शुक्रिया अदायगी अपनी 
है इक तरफ आपके इन्तेज़ाम की घड़ी 

आओ चलें "नील" धूप   के शहर की ओर ,
भायी नहीं हमें सुहानी शाम की घड़ी

Saturday, October 1, 2016

तूफ़ान !!

तूफ़ान से कुछ डालियाँ  टूट गयी हैं
शज़र  अब  भी  वहीँ   है


आज मालिन के बच्चे भूखे नहीं सोयेंगे !