Tuesday, January 1, 2019

हैं हम जूनून-ए-हिंद



बाकी  है  अभी जीने   की  ललक
ललचा न ए दूर खड़ी बेदर्द फलक    

तू सूरज की लाली को छूपा  बैठी है 
तो हम रक्त से अपनी माटी को सींचा करते हैं !!

चाँदनी ऐसे न सता हमें तू  आकर ,देख वहां बस्ती में अँधेरा है 
हम वहां शमा रोज़ जलाया  करते हैं !!

ए बादल तू बेमौसम बरस न इतराया करना 
हम राह गुज़र की प्यास बुझाया करते हैं !!

ए समुंदर तू लहरों से क्यूँ खेलता है 
हम ख़्वाबों से मोती निकाला करते हैं !!

तेरे मोती हैं दूर बहुत गाँव से 
हमारे गीतों की माला वहां के हर लाल  गाया करते हैं !!


हरे हो गए हैं अब सारे सपने ,घास पर नंगे कदम रखते रखते 
ए साख गुलशन के न वहम कर ,हर मौसम हम लहलहाया करते हैं !!

 जब तलक इस सांस की सिसकियाँ हैं 
खुली हमारे दिल की खिड़कियाँ हैं !!

आ जाओ हम ख्वाब बनाया करते हैं 
आ जाओ हम पर्वत को दहलाया करते हैं !!

हैं हम जूनून-ए-हिंद  , तमन्ना अपनी घर छोरे आये हैं 
हम तुम्हे चैन से सोने के खातिर  ,रोज़ खुद  को जगाया  करते हैं !!

हम ख्वाब बनाया करते हैं ,हम ख्वाब बनाया करते हैं!! 

No comments:

Post a Comment

हैं हम जूनून-ए-हिंद

बाकी  है  अभी जीने   की  ललक ललचा न ए दूर खड़ी बेदर्द फलक     तू सूरज की लाली को छूपा  बैठी है  तो हम रक्त से  अपनी माटी को  सींचा करते...