Sunday, May 6, 2012

तुझसे पहचान हो मेरी


जैसे एहसासों से बनी कोई तश्वीर हो
किसी दरवेश की बंदगी -ओ -ज़मीर हो

मेरे गुरबत्त में भी चिराग जलता रहे
"माँ " तुझसे पहचान हो मेरी , तेरी तौकीर हो

अना

  कब तक ये झूठी सी अना रखोगे कभी तो पस-ए-आईना रखोगे !!   वो पूछते हैं क्यों फ़ना रखोगे तो, ईश को कब तक मना रखोगे ?   कैसे होगी जीत बाज़ी की...