Sunday, May 6, 2012
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अना
कब तक ये झूठी सी अना रखोगे कभी तो पस-ए-आईना रखोगे !! वो पूछते हैं क्यों फ़ना रखोगे तो, ईश को कब तक मना रखोगे ? कैसे होगी जीत बाज़ी की...
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कब तक ये झूठी सी अना रखोगे कभी तो पस-ए-आईना रखोगे !! वो पूछते हैं क्यों फ़ना रखोगे तो, ईश को कब तक मना रखोगे ? कैसे होगी जीत बाज़ी की...
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उसके गीतों के ज्वाला ने लोहा तक पिघलाया था सोये भारत मन में भी एक नवसंचार जगाया था उसके कलम में वीरों के शहादत का प्रतिशोध था भारत माता...
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सागर से मिलने से पहले नदियों का विस्तार तो देख, मिट जाने से पहले अपने होने का आधार तो देख कुदरत है आँखों के आगे, कुदरत है मन के भीतर भूल ...
