Saturday, September 26, 2026

शायद वो पत्थर की लकीरें खींचता नहीं

संचित किए ही जाते हैं, कोई सींचता नहीं 

इस धरा पे क्यों मानव का मन रीझता नहीं

 

क्यों रव्वैये आज भी उसके पुराने हैं, 

शायद वो पत्थर की लकीरें खींचता नहीं

 

है उसको ये गुमान कि उसमें आ गयी हुनर, 

मेरी हार से लेकिन वो कुछ भी सीखता नहीं

 

मेरे सामने कोई नज़्म को कहना नहीं बुरा 

मानव नहीं हैं, शब्द हैं, कोई नीचता नहीं

 

आते हैं सब को तौर तरीके बहुत से "नील" 

देखी है अब तक किसी में दृढ़ता नहीं

Friday, September 25, 2026

मौन

बहला रहे हैं सब यहाँ, अब कौन है अपना 

कहने को हैं सदाएँ संग, बस मौन है अपना

 

उनकी निगाहों में ही कोई और दृष्टि है, 

या सत्य में अविरल ये कौशल गौण है अपना

 

 

 

 

 

 

 

Tuesday, September 15, 2026

फर्ज

किया जो फर्ज था पर, इनाम उसमे ढूंढेंगे 

धूप लाजिम है, नसीम-ए-शाम उसमे ढूंढेंगे

 

जो डायरी लिखोगे, अपना नाम उसमे ढूंढेंगे 

हम तो शायर हैं ,बस कलाम उसमे ढूंढेंगे

 

बहुत शिद्दत से निभाया है उसने रिश्ता, 

ऐब कुछ लोग ,सर-ए-आम उसमे ढूंढेंगे

 

मदद ही कर रहे थे, कमी कहाँ निकाली 

नहीं मालूम था वो इल्जाम उसमे ढूंढेंगे

 

नफे की बात न कर, है रब का घर साहब 

आप अपना काम ढूंढें, हम राम उसमे ढूंढेंगे

  

अगर सागर में ही ढूंढना है "नील" मोती को, 

भले हो जाएँ हम नाकाम, उसमे ढूंढेंगे

Sunday, September 6, 2026

दायरा

हम जो चुप रहे तो फिर हमारी खता समझ गए, 

हम बहुत ज़ल्द ,इधर का, कायदा समझ गए।

 

आप थे ख़ामोश जब हुई पेशगी अपनी वहाँ,,

कुछ इस तरह की बात थी, हम माज़रा समझ गए।

 

पैर उतना ही पसारा ,जितनी मिली चादर हमें, 

हम तो दरिया थे नहीं, तो दायरा समझ गए।

 

हर नज़्म तो बस दाद के खातिर नहीं लिखी कभी, 

पर आप ही इसको महज़, मुशायरा समझ गए।

 

कुछ देर के खातिर हम दूजी कलम लेने गए, 

"नील" को तो आप आख़िर लापता समझ गए।

Saturday, September 5, 2026

बस एक मुलाक़ात

इसको महज़ बात न समझो, 

बस एक मुलाक़ात न समझो।

 

ढल जाता है सूरज भी रोज़-रोज़, 

इसको कभी भी मात न समझो।

 

हो जाएगा रोशन हर पन्ना, 

बस कोरा एक दवात न समझो।

 

करते हैं रब से ही गुज़ारिश, 

नज़्म को सवालात मत समझो।

 

शोहरत और ये शहर की महफ़िलें, 

बस इनको ही कायनात मत समझो।

 

देता है पेड़ सबको अपनी छाँव, 

इसको तो तुम ख़ैरात मत समझो।

 

शायर की मुश्किलें बहुत हैं "नील",

रंगीन ख़यालात मत समझो।

पहचान

 

खोये कहाँ हैं, अब किधर पहचान है बाक़ी, 

उखड़ी सी हैं साँसें, मगर अरमान है बाक़ी।

 

काग़ज़ है अपना मन्दिर, और कलम मेरा ख़ुदा, 

बस थाम लूँगा उसको, ईमान है बाक़ी।

 

हर रक़्स में वही हैं, धुन में वही बसा, 

जो वो है तो हम में भी, इंसान है बाक़ी।

 

हैं नज़्म, गीत और कुछ अशआर के मुरीद, 

अभी "नील" का  पूरा इक दीवान है बाक़ी।

Sunday, May 18, 2025

नदियों का विस्तार तो देख

सागर से मिलने से पहले नदियों का विस्तार तो देख, 
मिट जाने से पहले अपने होने का आधार तो देख 

कुदरत है आँखों के आगे, कुदरत है मन के भीतर 
भूल के माजी की खामोशी, आज के ये त्योहार तो देख 

स्याह अँधेरे में कब तक ये मशाले साथ निभायेंगी 
शम्मा बन जा खुद हि फिर जीवन की रफ्तार तो देख 

ऐ राही मेरी आँखें तो, पत्थर की हो गयी कब के, 
तू अपने अंतर्मन से ,इन आँखों में प्यार तो देख 

कितनी कमियाँ हैं गजलों में, नज्मों में, छंदों में "नील" 
इनसे है रूसवाई किनको, किनको है स्वीकार तो देख

शायद वो पत्थर की लकीरें खींचता नहीं

संचित किए ही जाते हैं, कोई सींचता नहीं  इस धरा पे क्यों मानव का मन रीझता नहीं   क्यों रव्वैये आज भी उसके पुराने हैं,  शायद वो पत्थर की लकीरे...