संचित किए ही जाते हैं, कोई सींचता नहीं
इस धरा पे क्यों मानव का मन रीझता नहीं
क्यों रव्वैये आज भी उसके पुराने हैं,
शायद वो पत्थर की लकीरें खींचता नहीं
है उसको ये गुमान कि उसमें आ गयी हुनर,
मेरी हार से लेकिन वो कुछ भी सीखता नहीं
मेरे सामने कोई नज़्म को कहना नहीं बुरा
मानव नहीं हैं, शब्द हैं, कोई नीचता नहीं
आते हैं सब को तौर तरीके बहुत से "नील"
देखी है अब तक किसी में दृढ़ता नहीं