Wednesday, April 1, 2020

खामोशियाँ आती हैं अक्सर

खामोशियाँ  आती  हैं  अक्सर 
कुछ  यादों  के  संग
चलो  हम  भी  महफ़िल  में  आयें 
दुआओं और फरियादों  के  संग

इन  खामोश  आवाजों की धुन  को  
तुम  भी  सुन  लो  न राही 
रह  जायेगी  बस  तन्हाइयां ही 
कुछ  पुरे अधूरे  वादों  के  संग

कुछ  टूटते हुए
ख़्वाबों  के  दरमियान
कुछ  अपनी  
और कुछ  तुम्हारी खुशियाँ

अफसाना  है  एहसासों  का 
अपने  नेक  इरादों  के  संग

अपने   नेक  इरादों  के  संग 

Saturday, February 8, 2020

राहों के दौरान


राहों के    दौरान  आये गये
सुर फिर वही सब सुनाये गये

कैद -ए - मशक़्क़त  तो था ही लिखा
जिरह से   क्यूँ भरमाये गये

ए फनकार तेरे लब से कभी
मेरे गीत क्यों न गाये गये

बच्चे बहुत जल्द सो जाते हैं
 बहुत देर से फिर जगाये गये

उन्हें लग रहा था कि हैं  संग संग
मगर साथ तो सिर्फ  साये गये

नहीं तीरगी की कर गुफ़्तुगू
सितम रोशनी में भी ढाये गये

हुये दफ्न जाकर अदालत में वो
जो हादसों से जलाये गये

"नील" आसमाँ के सितारे बहुत
अज़ीज़ इस जमीं में मिलाये गये


Saturday, February 1, 2020

खुशबू को न तौलो


ए  दोस्त  कहाँ  हो  ,कैसे  हो  ,बोलो  न , कुछ  तो  बोलो
बात  बनेगी , राह  दिखेगी  ,अपने  अंतर्मन  को  खोलो
धुप  ,छाँव  ,शहर  और  गाँव  ,सब इक  से  हो  जायेंगे
महफ़िल  तुम  जहाँ  बनाना  ,अधरों  में  मिश्री  को घोलो

देखो  चरवाहा  अपने  भेड़ों  से  प्रेम  कितना  दिखाए
देखो  माली  गुलशन  के  खातिर कितना स्वेद बहाए
तुम  भी  अब  अपनी  कोशिश  से   नया  तराना  लिख दो
हर  गुल  की  खुसबू  है  अच्छी  ,खुशबू  को  न  तौलो

आओ  ,दीप  जलाओ ,फिर  से , नया  सवेरा  लाते  हैं
अमन  ,चैन  ,दोस्ती  का  इक सुंदर  मकान  बनाते  हैं
उम्मीदों  का  दामन  रखना  ,आगे   बढ़ते  जाने
अपने  मन  पर  पड़ी  धुल  को  भक्ति  से  तुम  धो  लो 

Friday, January 24, 2020

रहे चाहत तो ...


जंग के मैदान के बाहर है अफवाह बहुत
कि जंग लरने को मिलते है तनख्वाह बहुत

इक छोटी सी चोंच और उसमें दो दाने
रहे चाहत तो मिल जाते हैं राह बहुत

शेख जी क्या जरूरत है पेशगी की कहें 
आपके  तस्सवुर में  खो जाते हैं गवाह बहुत

तुम जो होते हो तो लोग बदल जाते हैं
तुम जो न हो तो बढ़ जाता है गुनाह बहुत

चाँद खामोश है क्यूँकि है अमावस "नील"
सुबह   होने से पहले रात होती है स्याह बहुत

Wednesday, January 15, 2020

हासिल नहीं जो चीज उसका क्या भरम

इस अजनबी बाजार में ख्वाब देखिये
 बोझिल हुये  सवालों के  जबाब देखिये

मोड़ पे खड़े हैं लिजे राह का भी ठौर
ये शेर नापसंद तो किताब देखिये

गुणा -भाग , जोड़ और घटाव चारो ओर
अजी भूल कर अपने हर हिसाब देखिये

सुकून हैरानी कभी इधर कभी उधर
हम देखें आपको हमें जनाब देखिये

कभी देखिये मिठास के दरमियाँ रकीब
कभी नोक झोक में अहबाब देखिये

है कसक मगर ये मेरे घर की बात है
यकीं न हो तो फिर   इज़्तिराब  देखिये

कोयल की काहिली और पहाड़ सा है  जुर्म
गर चिंटियाँ करेंगी इंकीलाब देखिये

हासिल  नहीं जो चीज उसका क्या भरम
जो चीज "नील " को है पायाब देखिये


Monday, January 13, 2020

खुदा पे किसका हक है

एक खत आने की आँखों में  चमक है जी
इत्र के शहर में  इस स्याही की महक है जी

तेरा होना तो मेरे   कारवाँ  में फलक है जी
कितना पा लूँ तुझे , तू तो दूर तक है  जी

किसी मासूम बच्चे सा हो जाऊँ तो अच्छा
मेरे लहजों पे दुनिया को  खुब  शक है जी

मैं उसके सिवा और वो मेरे  बगैर  है क्या
मैं गुड़   उसके  लिये  और वो मेरा नमक है जी

बहुत से फूल, पौधे, तितलियो, भंवरों पे अना
तेरे  बागों तक आने को पथरीली सड़क है जी

कभी पूजा, कभी सज़दा ,कभी अरदास भी करें
उलझना बाद में कि खुदा पे किसका हक है जी

एक दाने के लिये भी हो  तो खुद पे ही  यकीं
"नील" जिन्दान के  हर पंछी का सबक है जी


Saturday, January 11, 2020

याद आये आदमी सा

पार जाने की कड़ी सा
बन गया है इक नदी सा

भूल के अक्स मजहबी सा
याद आये आदमी सा

तआ'रुफ़ उसका  दूर से दे
पास बैठे अजनबी सा

रुक गया तो हैसियत क्या
चमचमाती एक घड़ी सा

बात सुनने में है बच्चा
बात बोले पीर जी सा

जो दिया आँगन सँवारे
वो दिया है चाँदनी सा

मुझको देकर तख्त ऐ फाँसी
कर रहा वो खुदखुशी सा

कोई भी अपना ले बेशक़
बे बहर सी शायरी सा

खुद पहल है "नील" भी अब
कह दो तो वो आखिरी सा

खामोशियाँ आती हैं अक्सर

खामोशियाँ  आती  हैं  अक्सर  कुछ  यादों  के  संग चलो  हम  भी  महफ़िल  में  आयें  दुआओं और फरियादों  के  संग इन  खामोश  आवाजों की धुन  को...