Subscribe to:
Post Comments (Atom)
शायद वो पत्थर की लकीरें खींचता नहीं
संचित किए ही जाते हैं, कोई सींचता नहीं इस धरा पे क्यों मानव का मन रीझता नहीं क्यों रव्वैये आज भी उसके पुराने हैं, शायद वो पत्थर की लकीरे...
-
उसके गीतों के ज्वाला ने लोहा तक पिघलाया था सोये भारत मन में भी एक नवसंचार जगाया था उसके कलम में वीरों के शहादत का प्रतिशोध था भारत माता...
-
सागर से मिलने से पहले नदियों का विस्तार तो देख, मिट जाने से पहले अपने होने का आधार तो देख कुदरत है आँखों के आगे, कुदरत है मन के भीतर भूल ...

सुंदर अभिव्यक्ति..
ReplyDelete