Sunday, December 29, 2019

बस उसी प्यार से

तोहफा दिया बस ,आपके नज़र में आ गये
जैसे कि अजनबी हमारे घर में आ गये

इक दाद की उम्मीद ही नज़्म हो गयी
अशरार खुद ब खुद ही बहर में आ गये

ये हादसा ही है ,कि अब जायेंगे किधर
जो बाज़ के लहज़े कबूतर में आ गये

चलते रहे जिस तरह घर के आँगन में,
बस उसी प्यार से दफ्तर में आ गये

हर बार रहबर की तरह से मिला था "नील"
हर बार हम सय्याद  के पिंजर में आ गये

Wednesday, December 25, 2019

फुर्सत



काम से कभी फुर्सत नही माँगी
चार दिवारी सही ,छत नहीं माँगी

फूल कलियों से नजाकत नहीं माँगी
और पत्थरों से ताकत नहीं माँगी

जब आये थे तो इजाज़त नहीं माँगी
जब गये भी तो नेमत नहीं माँगी

दो चार पल की जिंदगी, है कीमती बहुत
तोहफे में इसलिये, मोहलत नहीं माँगी

महफ़िल-ऐ-अहबाब में न पेश किया रंज
मुख़ालिफ़ों से  भी राहत नहीं माँगी

यकीन कर लिया पर आमद-ऐ-वफ़ा
कोई भी सूरत-ऐ-हालत नहीं माँगी

जिस शगल में आपका मिसाल है कायम
हमने वहाँ कभी महारत नहीं माँगी

इस मुल्क के हैं, हर नफ़स देता है शुक्रिया
हमने  कोई हुकुमत-ऐ-विलायत नहीं  माँगी 

तुम्हें याद रखने की कोशिश रहेगी "नील"
कभी भूल जाने की आदत नहीं माँगी


Wednesday, December 11, 2019

माज़रा


हाथों की लकीर पर है एतबार आपको !
जाने किस नसीब का है इंतजार आपको ?

जिंदगी बाँटिये, समेटिये , समझाईये !
मौत तो हर पल करेगी बेकरार आपको !

आपकी अदायगी से बज़्म फिर ग़ुलज़ार है !
किसने कर दिया भला फिर दरकिनार आपको ?

लेना था लगा रहा कि आपको थी क्या कमी ?
देना पर रहा हिसाब किश्तवार आपको !

मुफ्त में ले जायिये बेशक गज़ल का कोई शेर !
गर नज़र आये कभी वो इश्तिहार आपको !


मुद्दत हुयी आया नजर किसको ये मर्ज-ए-सफ़र !
आया नज़र किसी ने कहा जब बीमार आपको !

आपने ही "नील" कोई फैसला क्यों न लिया ?
दिख रहा था माज़रा जो आर-पार आपको !



Saturday, December 7, 2019

हलवाही



सीधी बात है  बदल जाओ ,  मगर  बदलो  नहीं
दायरा जो आपका है उससे  परे निकलो नहीं !

दाने दाने पे लिखा है खाने  वालों का ही नाम
दाने में तो दान भी है ,   स्वाद से बहलो नहीं 

लो पिघल रहा है हिमखंड जल देने को
मोम ने दी रोशनी पर आप क्यूँ पिघलो नहीं ?

हँस कागा दोनों के विवेक का है इम्तेहान 
दूध पानी सामने है ,किसको रखो ,किसे लो नहीं

"नील" का खलिहान तेरे साथ है  लेकिन सुनो 
खुद के हलवाही पे बस यकीन रख ,पिछलो नहीं



Thursday, December 5, 2019

हिम

हिम की सतह सा है ये मन देखो
टोह  लेता ही रहे ये निर्वहन , देखो

फिर पिघल रहा है ओ  मेघों इसे सम्भालो
फिर भी चलता रहे आवागमन ! , देखो

दो बूँद पानी के स्वपन के लिये अब
हिम के शिखर का वो पतन ! , देखो

एक शीतल श्रोत सिंचित किया कर  जतन
हो रहा गंगोत्री का अवतरण , देखो

ये हिम शिखर आज सिंधु में मिला है
क्या तेज जा रहा है वो निमग्न , देखो

"नील" नभ के ओलों में भी प्रीत रस समायी
आज इस विराट हिम से मिलन देखो


Friday, November 29, 2019

कमी


कह दिया सादगी से , हमारी कमी ?
उम्र बस जा रही है, जारी कमी !

आहटें दर पे रोज़ देती हैं
खटखटाती हैं बारी बारी कमी!

आपका और हमारा वजूद भी है
आपका है हुनर जो ,हमारी कमी!

दिन की हलचल में आन रखते हैं
रात चुपके से फिर गुजारी कमी!

कोई तो कुछ कहो  मुलाज़िम को 
बात दर बात पे सरकारी कमी ?

कितनों को चढ़ी नशा ए कमीयाँ ?
पी के फिर बारहा उतारी कमी !

"नील" यूँ माँगना कि कर न दें
एक दिन बेबस और जुआरी कमी 





Tuesday, November 26, 2019

बेसब्र

कितना बेसब्र है , भागा भागा जाता है। 
रखा है पूरा , मगर ले कर आधा जाता है 

ए बच्चे ! न लूट अजनबी गलियों में 

तेरे छत ही से पतंगों का धागा जाता है

सहेज के न रख ए   शेख़ ये जुबानी गोले 

हम सरहद पे हैं यहाँ बारूद दागा जाता है

घूंघट की आड़ में दीदार तो रूमानी ही है 

किसी  आड़ में ही मतलब भी साधा जाता है।

तोहफे देने की उसूल है कि अब तोहफे में 

खुद के होने का सबूत माँगा जाता है

भेजने वाले को पहचान लेते हैं 
अज़ीज़

जब बेढंग तहरीरों का लिफाफा जाता है

"नील "  आकाश के छतरी के ही सहारे हूँ 

देखना है मगर कब ये कुहासा जाता है 







Monday, November 25, 2019

गहराई

एक टूटे हुए पत्ते ने जमीं पायी है ,
जड़ तक पहुंचा दे ,ये सदा लगायी है !

सादा कागज है मुंतज़िर कि आये गजल
क्या कलम में  हमने भरी रोशनाई है ?

झील में मारकर पत्थर न दिखाओ सागर
झील की सादगी भी हमको रास आयी है !

हर तरफ आईने ,हर आईने में कई चेहरे,
किस चेहरे में जी ने सुकूं पायी है  ?

वो तो है रोशनी जो हो तो है सबकी आन
कभी कह दो उसे पर्वत या कहो राई है !

ठुकराऊँ खुद "नील" की कई गहरी बातें
नीले सागर से ही पायी ये गहराई है !

Monday, November 18, 2019

बादल के पर्दे

कहाँ तक जायें  कि कोई किनारा कहाँ 
चुभती है सुई की घङी ,मझधारा कहाँ 

हम जमीन वाले , आसमान है तेरा 
चमकता  है अब हमारा सितारा कहाँ 

तुम बादल के पर्दे को हटाकर देखो 
कहाँ गिरे बर्फ , बढ़ा है पारा कहाँ 

ये वक्त की लहर है , समँदर सा ज़ीस्त 
लौट के फिर आयेगा दोबारा कहाँ 

बदस्तूर  है ज़ारी एक जंग  अज़ल  से ,
दिल जुबाँ दोनो तुझपे वारा  कहाँ 

क्या है तेरी ख्वाईश कि तुझसे "नील "
कोई जीता किधर ,कोई हारा कहाँ




Friday, November 15, 2019

एक काठ की नाव

जब आयी है मुकाम की घड़ियाँ करीब आज तो
कर काशिशें इक बार फिर भूलो नसीब आज तो

बोलों का ,गीतों का ,एहसासों का इम्तेहान है
बाग में हमने बुलाये   अंदलीब  आज तो

 दिवारों को,मुंडेरों को और दर-ओ-दरवाजों को
जाना की सम्भालता है कोई नीब आज तो

यूँ तो रख रहा था वो रश्क-ओ-रंज बारहा
बन गया है देख लो खुद का रकीब आज तो

लहरों की मार कारवाँ के बोझ से ऊँघा हुआ
एक काठ की नाव पर सोया गरीब आज तो

आखिरी पन्ने से अब पढ़ना शुरू ए "नील" कर
तुझ को लगेगा फलसफा कितना अजीब आज तो

Monday, November 11, 2019

जो कहते हो तुम वो कोई ना कहे

कैसी शगलों में रहते हो डूब जाते हो
नौकाओं को देखो जब भी ऊब जाते हो

पेड़ पुकारे जड़ के लिये , तुम प्रेमी पत्तों के
दर्शन के अभिलाषी  मिलने खुब जाते हो ,

हमने खुद को बदला या तुम मन के ईश्वर
भ्रम में रखते हो बन कर महबूब जाते हो

जो कहते हो तुम वो कोई ना कहे कभी
जब लिख  दूँ वो सब ,कह के मकतूब जाते हो

नील से पहले भी, बाद भी,संग भी हो मौजूद
क्या कहकर महबूबों के महबूब जाते हो ?




Tuesday, November 5, 2019

ये कल्पना भी नहीं!

कल्पनाओं को छान यूँ यथार्थ करूँ,
अपने अंतः करण को कृतार्थ करूँ

कभी बन जाऊं स्वयं कृष्ण अबोधों के लिए,
कभी विस्मय में हूँ तो स्वयं को ही  पार्थ करूँ

तू प्रति क्षण मेरा दर्पण है,मेरे छन्द तुम्ही पर अर्पण हैं,
तू ही  टोके जब स्वार्थ करूँ,तू  कह दे तो परमार्थ करूँ

ये कल्पना भी नहीं की विस्मरण हो,
प्रभु ! ,जो कह दिया ,उसे कैसे चरित्रार्थ करूँ

Sunday, November 3, 2019

मंथन

 सामने  शगल  हो जो  हर  रूप    में   पानी  हो
जिसके  खातिर  अपनी  हर  साँसें  दीवानी  हो 

खिंच  कर  ले  जाते  हो  अब  किस किस  दयार में ?
ऐसा  भी  नहीं  कि  राहें  जानी  पहचानी  हो  !

बार  बार  बदल  रहे  हो  कपड़े ,नहाना  गौण  हआ  ?
देख  लो  कोई  इत्र  भी तुमको शायद अभी  लगानी  हो  !

इस  समँदर  का   मंथन  करूँ तो  बस  मैं  कैसे ?
कोई  शिव ,कोई  वासुकी-मंदार ,कोई  चक्र  पाणी  हो 

सब  रँग  बनाये  हैं   लेकिन एक चित्रकार  नहीं ,
इस  रँग -ए -महफिल  में क्या वाज़िब  निशानी  हो  ?

जगमगाया  हुआ  शहर है घृत तैल के दीपों  से ,
एक   रोटी  ही  सही  किसी  भूखे    को  भी पकानी  हो  ?

ये  कागज़ , कलम  और  स्याही  ,सब से कर दे जुदा हमें ,
ये  शगल  , "नील " और  कोशिशों  की कोई उम्दा ही  कहानी  हो

Saturday, November 2, 2019

झील


किसी  ने  झील  की  गहराई  मापी ,किसी  ने  झील में  पत्थर  मारा ,
कोई  तैराक  था  तो  दी  झपकी ,किसी  ने  खून  बहाकर  मारा

किसी  ने  धूल  की  तिलांजलि  दी  ,कर  दिया  सर  का  आग़ाज़ 
किसी  ने  जोड़  दिया नहरों  से ,उसे  दरिया  बनाकर  मारा

किसी  ने  भेजा  धूप  को  जो  ले  गया  बादल  के  तोहफे ,
किसी  ने  ज़मीं  और  बादल  के , बीच  में  आकर  मारा 

किसी  ने  खोल  दिया नौकाओं  का  एक  अनोखा  सा  शहर,
किसी  ने  सब  ख़त्म  करने  का , एक  आखिरी  मोहर  मारा

"नील " इस  झील के  उस  पार  ही  इसकी  मर्ज़ों  की  दवा  होगी ,
ऐसा  लगता  है   इस  पार तो , वक्त  ने   हर चारागर  मारा


Friday, November 1, 2019

खाली प्याला


हम  बूंदों  से  अपना  खाली  प्याला  भर  लेंगे  ,
अब  साकी  ने  पिलाना  छोर   दिया  है .......

वैसे  भी  मिलावटी  है  आज  शराब  भी  ,
बादलों  से बरसे   आब-ए-हयात को   पिऊंगा  तो  शायद  कुछ  बात  बन  जाए ..

सौदा

बात  करते  रहो  ,उलझते  रहो,नया  आयाम  पैदा  होगा ,
अब  मेरे  और  मेरे खुदा  के  बीच ,बहुत  प्यारा  सा  सौदा  होगा 

रोज  गुस्ताख़ आँखें  साथ बैठेंगी   ,रोज  मुरझायेंगे   लबों  के  फूल 
राहें  में  रब  से  मिला  ,अब  तुमसे , दोस्त  मेरे  ,मसौदा  होगा 

फूल  महकेंगे  मगर खुशबू  की  कोई  ख्वाहिश भी तो  करता  हो ,
हम  तो  बीज  देर  से  लाये ,तू  लगा  दे  कभी ,वो  पौधा  होगा 

कोई  कहता  हैं  कि  ये  मुश्किल  है  , कोई  कहता  है  कि  बहुत  आसाँ 
पर  "नील " ये  भी  कहता कोई ,  जो  भी  होगा  होगा !

Thursday, October 31, 2019

तितली

बादलों  के  डाकिये   बूंदों  की  चिट्ठी  समेटे  छत  से  गुजरते  हैं ---

मेरी  जमीन  पर  
काँटे  थे , तो बरस  गये !

अब  हरे  घास  हैं  मखमली ,काँटे  नहीं ,पर  लौट  गये  बिन  बरसे !

और  तब बगल  वाली  सुँदर  बगिया  की  तितली हैरान  थी 
और 
अब  मेरे  सपनों  की  तरह  हरे  इन  घासों  पर  मंडराती तितली 

हैरान  तितली का होना अनवरत  और अविरत  है 

मेरे  मन  तितली 
घास सपने 
ये  जमीन  जीवन 
और  काँटे
कठिनाइयाँ   ही  तो हैं ,

पर सबसे बड़ी कठनाई इस निष्पक्ष ,निश्छल बादल के डाकिये को समझना है ,

आखिर कैसे बाँटता है ये चिट्ठियाँ ?

Tuesday, October 29, 2019

स्वासों को ऐसी धुन दे दो

विविध विचित्र विषों को संचित करते हो
कितनों को अमृत पीने से वंचित करते हो 

ये ज्ञात नहीं कितनों को अह्लादित करते हो ,
हर आयाम अपने ही मनोवांछित करते हो

अहम् का पर्वत राहों में ,मत मानो अपनी भूल
नाम छोटी योगदान में भी अंकित करते हो

तुम अपनी उँगलियों से लिखो कोई इतिहास ,
उनको अकारण ही सब पर इंगित करते हो

क्षमा ,दया ,धैर्य , समभाव सब रखते हो गौण ,
क्रोध ,मोह ,मद ,आडम्बर आप त्वरित करते हो

ये कैसी श्रद्धा जो निश दिन करते हो पूजा ,
हर दिन परमेश्वर को पर लज्जित करते हो

वर्तमान कर्मा का रथ है,भविष्य सारथी है ,
अतीत अनुभवों का गुरु ,क्यों चित्त चिंतित  करते हो

आओ अपने हर स्वासों को ऐसी धुन दे दो ,
जो कहे सब "नील"  तुम रोमांचित करते हो

Sunday, October 27, 2019

जीवंत दीपक

जिस  प्रकार  इक  छोटा  सा  दीपक  आँखों  को  ज्योति  दे  सकता  है  पर  खुद  उसके  तले   अँधेरा  रहता  है
अथार्थ
श्रेष्ठ  परोपकार  करने  में  स्वयं  को  परे  कर  देना  परता  है
फौजी  खुद  अपने  घर  नहीं  जा  पाते  पर  हमारा घर  में  होना  सार्थक  करते  हैं

किसान  वर्षा , ताप  और  हवाओं  को  झेलते  हैं  पर हमें  अन्न  और  प्रसाद  की  कमी  नहीं  होने  देते
गुरु  स्वयं लघु  और  तपस्वी  की  भाती  जीवन  व्यतीत  करता  है ताकी   उसके  शिष्य हर  ऐश्वर्य से  परिपूर्ण  हो  जायें

मज़दूर हमारे कार्य साधने में अपना समर्पण करते हैं

माता  पिता  अपने  संतति   की चिंता  करते  हैं  और  उनकी मनोइच्छाओं  को  पूरा  करते  हैं

आईये  जीवंत  दीपकों  का  स्मरण  और  अभिवादन  करें

खामोश  मुहब्बत

कबूतर  ताकते  हैं  छत  से  कोई  दाना  लायेगा  
इस  सुन्दर  से उपवन  में   कोई  दीवाना  लायेगा 

बहुत  उत्सुक  हैं  वो  लेकिन चुपचाप   बैठें  हैं ,
कोई  लायेगा खुशियाँ  उनकी  या  कोई  ना  लायेगा 

हुई  आहट  की  वो  फुर्र  से  उड़े   ,फिर वापस  उन्हें  नीचे ,
किसी  खामोश  मुहब्बत का  ही फसाना लायेगा 

टहलना  तो  बहुत  ही  कायदे  से  तुम  टहलना "नील ",
बहुत  मासूम  हैं ,उन्हें  इस  तरह  ही  आना लायेगा

Friday, October 25, 2019

विष 

रंजिशें  कर  रहा  हूँ  खुद  से , ए वाईज़ तुझे बुरा  कह  के ,
क्यों  नहीं  शिव  सा  पी  लूँ  ये  विष  भी  सुरा  कह  के 

उसने  खुद  तक  किया  मुझे   सिमित , पूरा कह  के ,
तूने  राह -ए -  खुदा  अब  दे  दी  अधूरा  कह  के 


दरीचा  रोशन  सा  हुआ  पंछी  को  जो  दाना  डाला   ,
आता  हूँ  तिनकों  को समेटे  अब   ,वो   उड़ा  कह  के 

हम  है  अदने से  , हर  नज़्म  में  बुलाया  रहमत  को  तुझे ,
कोई  तेरा  चैन  न  ले  "नील "  इनसे  जुड़ा  कह  के !




Thursday, October 24, 2019

सोच

किस  पे  रखूँ  यकीं  कि  हर  कोई  कभी  खास  ही  था ,
झूठ  और  सच  है  क्या ? ,मेरा  खुदा  मेरा  विश्वास  ही  था !

मुझको  सहरा  में  बहुत  लोगों  ने  सहारा  भी  दिया ,
कई  अजनबीयों  को  किया  अपना , वो  मेरा  प्यास  ही  था !

आज  ओढ़  के   तुम  कात  रहे  हो  , वो  है  मेहनत !
ये  सूत   है  इक  सोच  , जो   शजर  का  कपास  ही  था 

उसको  खत  दे  कर  मत  तोड़  ,ए   नादाँ  काशिद ,
"नील " आयेगा  फिर  उसी  राह  पे  उसे  आस ही  था


Wednesday, October 23, 2019

बेहोश 

जिसे  करना  है  फर्ज़  पूरा  ,वो  खामोश  है  जी !
वक़्त  पे  कर  पहल  नादाँ , तो  क्या  दोष है  जी ?

तोहमतें  दे  रहा  है  ,कर  रहा  है  तू  और  मैं ?
चल  रही  जुबान  ,दिल  और ज़ेहन  ,बेहोश  है  जी !

किस  शहर  में  तुझे  ढूंढू ए  खुदा , कहाँ  जाऊँ !
बेनक़ाब  कौन  यहाँ  ,कौन  नकाबपोश  है  जी ?


वो  जुलाहा  है  ,जो  सूत  को भी  चादर  कर  दे !
ये  है  मीठी सी  जिद्द  हर  रोज़  , मत  कहो  जोश  है  जी !


सब  को  बेशक  ही  मेरे  किस्से  कह  दे  "नील "!
न  ही  पहले  किया  था  रोष  ,न  अब  रोष है  जी !

Monday, October 21, 2019

बादल

तू   इक  सूत   के  जैसा   है , जो  ठोस  ना  है  ,पर  कोमल है
मेरे  कपड़े   तेरी  सीरत   है  , मेरे  चादर    तेरा   ही  बल  है !

मेरी  साँसें   हैं  ये  काले  हर्फ़ ,ये काफिया ध्यान मेरे  मन  का
मेरा   घाटा   है  बेमानी  शेर , गज़लों  में  हरदम  हल   है !

तुम  प्याला  ले  कर  आये  हो , खलिहानों   में  पानी   देने ,
तुझको   प्याले   पे  नाज़   बहुत ,उसका  प्याला  वो  बादल  है !

कभी  नील  तुम्हारी  आँखें  हैं ,कभी  नील  नदी  का  तीर तेरा
कभी  नील  गगन  का  बादल  है ,कभी  "नील " तो  गोया  पागल  है !

Saturday, October 19, 2019

इक शाम सा हूँ मैं बौराया

मुद्दत  हो  गयी  मैंने  तुझको  भेजा  ही  नहीं  कोई  डाक  सनम
मैं  साथ  ही  हूँ  साँसों  की  तरह ,तू  खिड़की  को  ना ताक  सनम

ये  हिज्र  भी  बड़ा  है  सौदाई  ,दर  पर  मासूम  सा  आ  जाये ,
मैं  दरवाजा  गर  खोलूँ  तो  ,हो  जाता  है  बेबाक  सनम

हम  बादल  जो  बन  जायेंगे  ,तेरे  घर  के  ऊपर  आयेंगे ,
हम  बिजली  ना  चमकायेंगे ,हमे  दुश्मन  में  न आँक सनम

हमने  तुमको  सच्चा  जाना ,कुछ  कह  पाया  इन  गज़लों  से ,
न  हम  ही  थे  मायूस  कभी ,न  तुम  ही  थे  चालाक  सनम

ये  जीवन  सुबह  की  है  धूप ,इक  रात  ने  चुपके  से  बोला  ,
इक  शाम  सा  हूँ  मैं  बौराया , हूँ  खुद  पे  अब  आवाक  सनम

तूने   पूछा   था  जाते  पल  ,क्या  दूँ  तुझको  ए  "नील " मेरे ,
तू दर्जी  है  मेरे  मन  का  , दे  सपनों के  पोशाक  सनम

Friday, October 18, 2019

Root/ जड़

जीव पेड़ों से घिरा हुआ है और शाखाओं के चंगुल के भीतर उलझ गया है,
खुद को मुक्त करने की कोशिश कर रहा है,
आने वाले तूफान से प्राणी मंत्रमुग्ध हो रहा है,

या तो "जड़ों वाले पेड़" होने का सौभाग्य प्राप्त करें
या जड़ रहित पत्ती की तरह मुक्त हो।

The creature is surrounded by trees and entangled within clutches of   branches , trying to free itself, the creature is being mesmerised by the  incoming storm , either get the fortune of being  the  "tree having the roots" or have the freedom  like rootless leaf. 



Thursday, October 17, 2019

वादों का सम्मोहन ?


प्रतिदिन हार  रहा  हूँ  खुद  को  किये  वायदों  से !

शाम  को   दश  मुखी  रावण  की  तरह  हँसते  है  मुझ पर  !!!

मैं  राम  भी  नहीं  कि  उनसे  टकरा  जाऊँ !!


सिवाय  इसके  कि  मैं  खुद  इक और  वायदा  कर  लूँ  निद्रा  मग्न  होने  से  पहले  और  दे  दूँ  फिर  उस  रावण को  इक और  वायदा रूपी  मुख   भेंट  में ?

युहीं  वो  रावण अजय  होता  जा  रहा  है 



न  जाने  अब  कोई  लक्ष्मण  मुझे  कायर  क्यूँ  नहीं  बोलता  कि  मैं  रावण से  पहले  अपने  खोखले  वायदों  से  टकराऊँ   ,क्यूँ  नहीं  वो  मेरे  मन के    चारो  ओर  समर्पण  और  कर्तव्यपरायणता  की  रेखा  खिंच  देता  है  जब मैं  मारीच रुपी वायदों की सम्मोहनी मृग की कल्पना  की  भेंट अपने अबोध  सीता रुपी मन को देकर  उससे अन्याय करने को स्वप्रेरित हो जाता हूँ और सिता का   अपहरण हो जाता है दशानन वचनों के द्वारा  !

क्यों नहीं मैं किसी भी सीता द्वारा मेरे वादों की अग्नि परीक्षा के लिए मजबूर हूं ?

क्यों नहीं किसी भी कैकेयी ने मुझे अपने वादों के शहर को छोड़ने के लिए मजबूर किया ?

किसी ने भी मेरे वादों के पैर क्यों नहीं हिलाए जो अंगद की तरह स्थिर  हैं



Tuesday, October 15, 2019

Experience/ अनुभव

ब्रह्मांड का कोई अंत नहीं है,
भले ही कलम थका हुआ हो,
सोचने का तरीका खुद एक कविता है,
अनुभव हमेशा एक गिलहरी की तरह सक्रिय होता है,
यह कभी नहीं थकता है,
दीपक तब भी जब यह अपने आखिरी कुछ क्षणों में होता है,  दूसरे दीपक
या
तेल की खोज के लिए आवश्यक है जो आत्म-प्रज्वलन के लिए आवश्यक है ,,

Their is no end to the universe ,
even if the pen is tired , the way of thinking is itself a poetry ,
The experience is always active like a squirrel , it never tired, 
The lamp even when it is in its last few moments, is  required for search for the other lamp or the oil which is needed for self  re-ignition ,,

Monday, October 14, 2019

Quest /ज़ुस्तज़ू

दो   घड़ी  के  ही  इस ज़माने में ,
ज़ुस्तज़ू  है कर दिखाने में  !

होता  है आसाँ  पार करने में ,
आती है मुश्किल पुल  बनाने में ?

रात और चाँद दोनों आये हैं ,
भूल हो जाये  ना निभाने में ?

सात  रँग  के ज़ेहन में फूल खिले ,
सादगी से यूँ पेश आने में !

हो तसल्ली कि  कुछ नया कर दें ,
कुछ कमी रह गयी पुराने में ?

जानते ही तुम भूल  जाओगे  !
एक मुद्दत हुई बताने में ?

उड़ रहे पंछी , सुबह आयी है !
देर काफी है शाम आने में !

तारे हैं दूर , पास है सूरज
क्या बुराई टिमटिमाने में ?

तुम सा कोई चारागार कहाँ ,
वक़्त कटता  है दवाखाने में !

रोज़ खुद से ही जंग क़ायम है ,
दर्द होता है हार जाने में  !

"नील "  कह दो या कह दो गंगा ,
पानी तो पानी  ,इस फ़साने में

Sunday, October 13, 2019

Shadows/ छाया

हम अपनी छाया का अनुसरण कर रहे हैं या यह है कि हमारी छाया हमें धक्का दे रही है, वास्तव में  हम अपने अतीत से नियंत्रित होते हैं और हम पूर्व धारणा,शिकायत,शत्रुता और कभी-कभी आत्म घृणा जैसी नकारात्मक भावनाओं को विकसित करते हैं। और उस स्थिति में हम अपनी छाया का पालन कर रहे हैं।  , लेकिन अगर हमारे पास एक अच्छी इच्छा है, तो हमारी छाया हमें प्रकाश की ओर धकेल देगी

Saturday, October 12, 2019

Urge on / तलब

एक  चाय  की  तलब  को  छोड़  भी  सकते  हो  क्या ,
पास  खुद  के  खुद  को अब  मोड़  भी  सकते हो  क्या !

ताश  के  पत्तों  के  घर  पर  भी अना कर  लेते  हो ,
नीब  अब  अपने मकाँ   में  जोड़  भी  सकते हो क्या !

वायदों  के  जाल  में  फँस  जाते  हो  ,फँसाते   हो  ,
तुम  ही  कह   दो  चाँद  तारे  तोड़  भी  सकते हो  क्या !

है  तुम्हारे  प्यार  का  इम्तेहाँ ! ,उस  नीम  से ,
तुम  शहद  की  बूँद , निचोड़  भी  सकते हो  क्या  !

गुल्लकों  में  क़ैद  खुशियाँ ,  किस शमाँ  का  इंतज़ार  ?
"नील " हर  कूचे  में  उनको  फोड़  भी  सकते हो  क्या !!

Friday, October 11, 2019

Fraction / अंश


आज  दिन  थोड़ा  जल्दी  शुरू  कर  दूँ  ज़रा
रात  को  टूटा  है  दिल , सुबह  रफू  कर  दूँ ज़रा !

तुमको  मेरे  नज़्म  -ऐ -अक्स  से  मुहब्बत  हो  गयी ,
खुद  को  भी  उसके  हू -ब -हू कर  दूँ ज़रा !

रँग  बिरँगी   जिंदगी  में   रँग -ए -यारी  का  सामान ,
थोड़े लम्हे  के  लिये  खुद  को  उदू (rival) कर  दूँ ज़रा !

चाँदनी  पर  रख  यकीं  अपने , और  मेरी  बात  काट ,
गर  अमावस  में  तुम्हारी  आरज़ू  कर  दूँ ज़रा !

बारी  बारी  से  जो  देता  धूप  हर  दिशा  को  "नील ",
अंश  उस  सूरज  का  तेरे  रू -ब-रू कर  दूँ ज़रा !

Thursday, October 10, 2019

Bridge/पुल

तुम  बहुत  हो  दूर  ! ,लेकिन  ,है  कविता  का  ये  पुल  ,
तुम अलग  हो ,मैं  अलग  हूँ , एक  गीता  का  ये  पुल !

जब  कभी  अथाह  सागर  ,कर  रहा  हो  इंतजार ,
सामने  पाओगे  तुम तब  उस  विधाता  का  ये  पुल !

सब  अलग  लगने  की  कोशिश  में  यहाँ  लगे  हुए  !,
सब की  रोगों के  लिये है  ,एक  दवा •••!!! का  ये पुल

मोम  के  पुल से  सभी  के  साथ  हम  क्यूँ  बँधे  ?,
धीमी  धीमी आँच पर  है राब्ता   का  ये पुल ?

Wednesday, October 9, 2019

Limit/सीमा


एक हिरण   सा  मन  है अपना ,कोई  कातिल ! ना  आ  जाये ,
कैसा  हो  हम सब  का  सपना ,अंतिम  मंजिल  ना  आ जाये !

सब  ने  सीमा  तय  कर  ली  है ,इंसान  को  तय करना  है ,
सागर  भी  मनमानी  करता  जब  तक  साहिल  ना  आ  जाये !

करते  हो  करनी  से  सौदा , पर  तुम में  तो  है  कितना  बल ,
कब  तक  समझोगे  जब  तक  कि तुमसे  काबिल  ना  आ  जाये !

हर्फों  को  तुम  पढ़  लेना ,आँखों  में  ना  जाना  डूब , 
चोटी   तक  जाने से  पहले  "नील " पे  दिल  ना  आ  जाये !

Tuesday, October 8, 2019

Proof / सबूत


the greenery will show the proof of the rainfall , no need to wait for the rainbow for the proof, the rainbow is a miracle or  [coincidence] and the greenery  , hardwork

हरियाली बारिश का सबूत दिखाएगी, सबूत के लिए इंद्रधनुष का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है, इंद्रधनुष एक चमत्कार या [संयोग] है और हरियाली, अथक परिश्रम

Boredome/उदासी


जिस कुएँ ने हमें जीना सिखाया है, वही कुआँ आज बारिश के उफान में डूब गया है,
और हमारा परिश्रम, उसे जीवन और गौरव में वापस लाने की प्रक्रिया में ऊब गया है

Sacredness/पवित्रता

Words should be kept as the sacred rivers by the mighty Himalayas , not owned ,but allowed to  flow and keep nourishing , if kept for the ego, flood of misery  is what we can  get

शब्दों को शक्तिशाली हिमालय द्वारा पवित्र नदियों के रूप में रखा जाना चाहिए, स्वामित्व में नहीं, लेकिन उन्हें बहने और पोषण करने की अनुमति दी जाए, अगर अहंकार के लिए रखा जाए, तो दुख की बाढ़ है जिसे हम प्राप्त कर सकते हैं,

Inspiration / प्रेरणा

What you wrote was already there, you have collected it and you are inspired

आपने जो लिखा था वह पहले से ही था, आपने उसे एकत्र कर लिया है और आप प्रेरित हैं

Monday, October 7, 2019

Question ?/ सवाल


कभी  कभी  जब  फर्ज़  पूछता  है  सवाल , 
कि  मुझ  में  भी  खुदा  है  ,ये  आता  है  ख्याल!  

हज़ारों  राह  हैं  चुप  चाप  भी  पूरा  कर  लूँ , 
मगर  देना  परा  खुद  को  खुद  ही  से  निकाल!  

तू  ना  तो  मकरी  है,  ना  ही  तू  मछुआरा  है ,
क्या  ज़िद्द  है  तेरी  कि  तू  फेकता  है  ये  जाल!  

समेटी  है  जो  तूने  खुशियाँ  , वो  छुपाना  नहीं , 
पेड़  बन  जायें  वो ,बीज  ना  तू  रखना  सम्भाल !  

तेरी  कमी  में  कमज़ोर  गर  हो  जाये  "नील ", 
ये  होगी  वादा  खिलाफ़ी ,तू  तो  है  मिसाल !!!



Sunday, October 6, 2019

Guest / मेहमान

दो  राहों  पर  जाकर  करते  हैं खुद  का  पहचान ,
अपनी  राहों  का  रहबर  खुद  बनता  है  इंसान!

काले  बादल  और बिजली  की  आहट  सुन  कर  के ,
चींटी सा  बन  जाये  तो  ,हो  जाये  सब  आसान !

करते  हैं  इस  घर  की  दीवारों  से  सब  प्यार ,
अपने  घर  में  भी  लेकिन  दो  दिन  के हैं  मेहमान

कैसी  फसलों  के  चक्कर  में  पड़   जाते  हो  "नील ",
तेरे  ही  कुछ  कागज़  पर  है  हर्फों  का खलिहान

Saturday, October 5, 2019

Misconception/ भरम

टूटे  हुये  शीशों  को  सजाओ  ना ,  दोस्तों ,
यूँ  आईनों   का  शहर  बसाओ  ना  दोस्तों !

रखते  हो  अगर  आईना  तो , रखो  साफ साफ,
भूल  कर  खुद  को  ही  ,आओ  ना  दोस्तों

कागज़ों  के  रेत  में  ये  हर्फ़  के   हैं  धूल ,
हर्फों  को  फिर  फूल  सा  खिलाओ  ना  दोस्तों

कहते  हो  वाह  तो  हो  जाती  है  रौनक ,
है  कमी  तो  , आज ,  छुपाओ  ना  दोस्तों,

रूठता  है  अब  नहीं   ये  "नील " भी  कभी ,
ये  भरम भी  तोड़  के  जाओ  ना  दोस्तों

Friday, August 30, 2019

अलग

रात कोई और ,सुबह और ,धूप छाँव अलग
अब मेरे लोग अलग ,देश   अलग ,गाँव अलग

खेल  जो खेलते   हो मैं भी था माहिर  जहाँ ,
पर मेरे ढँग अलग और तुम्हारा  दाँव अलग

राह ही राह ,मंजिल पे ले जायेगी कौन ,
"नील " मेरा जेहन कहीं और ,मेरे पाँव अलग

Wednesday, May 1, 2019

निशाँ छोड़े जाएंगे


जहां  रब  ले  जाए  ,चले  जायेंगे  ...
दीवाने  हैं ,वादा  ज़रूर  निभायेंगे
मिली  मंजिल  तो  ठीक  ,उसकी  मर्ज़ी ,
न मिली तो  राहों पर सच्चे  निशाँ छोड़े  जाएंगे

Saturday, March 16, 2019

वही  बात

वही  बात  फिर   दोहरा  के  तो  देखो ,
जहाँ  से  चले  ,वहीं  जा  के  तो  देखो !

खलिश ,धूल ,शक  सब  हटा  के  तो  देखो ,
नज़र  से  नजर  अपनी मिला  के  तो  देखो !

स्याही  से  कागज़  नाराज़  क्यूँ  है ,
कलम  से  ये  मसला  बता  के   तो  देखो !

हर  इक  हर्फ़  में  है  गज़ल  "नील " तेरी
तुम  इक  हर्फ़  को  दिल  से  गा  के  तो  देखो !

Sunday, February 10, 2019

धुन

वो मौसम  सा नहीं ,एक सवेरा  है 
शाम ढलने तलक ही हो ,  वो मेरा है 

धुन मुझे मेरा  ही ले जाए दूर कहीं ,
मन को रोके हुए वो  एक  सपेरा है 

जाने किस किस पत्थर को  हटायें यारब ,
हर सू उलझन है ,हर सिम्त बखेरा है 

ढूँढ लेना आते हो जिन राहों से ,
अपनी अक्सों को मैंने वहाँ बिखेरा है 

है अकेला नहीं ,शायर है ,कोई कह दो 
"नील" के घर में गज़लों का बसेरा है 

Tuesday, January 1, 2019

हैं हम जूनून-ए-हिंद



बाकी  है  अभी जीने   की  ललक
ललचा न ए दूर खड़ी बेदर्द फलक    

तू सूरज की लाली को छूपा  बैठी है 
तो हम रक्त से अपनी माटी को सींचा करते हैं !!

चाँदनी ऐसे न सता हमें तू  आकर ,देख वहां बस्ती में अँधेरा है 
हम वहां शमा रोज़ जलाया  करते हैं !!

ए बादल तू बेमौसम बरस न इतराया करना 
हम राह गुज़र की प्यास बुझाया करते हैं !!

ए समुंदर तू लहरों से क्यूँ खेलता है 
हम ख़्वाबों से मोती निकाला करते हैं !!

तेरे मोती हैं दूर बहुत गाँव से 
हमारे गीतों की माला वहां के हर लाल  गाया करते हैं !!


हरे हो गए हैं अब सारे सपने ,घास पर नंगे कदम रखते रखते 
ए साख गुलशन के न वहम कर ,हर मौसम हम लहलहाया करते हैं !!

 जब तलक इस सांस की सिसकियाँ हैं 
खुली हमारे दिल की खिड़कियाँ हैं !!

आ जाओ हम ख्वाब बनाया करते हैं 
आ जाओ हम पर्वत को दहलाया करते हैं !!

हैं हम जूनून-ए-हिंद  , तमन्ना अपनी घर छोरे आये हैं 
हम तुम्हे चैन से सोने के खातिर  ,रोज़ खुद  को जगाया  करते हैं !!

हम ख्वाब बनाया करते हैं ,हम ख्वाब बनाया करते हैं!! 

मेरी जुस्तजू पर और सितम नहीं करिए अब

मेरी जुस्तजू पर और सितम नहीं करिए अब बहुत चला सफ़र में,ज़रा आप भी चलिए अब  आसमानी उजाले में खो कर रूह से दूर न हो चलिए ,दिल के गलियारे में ...