Sunday, September 6, 2026

दायरा

हम जो चुप रहे तो फिर हमारी खता समझ गए, 

हम बहुत ज़ल्द ,इधर का, कायदा समझ गए।

 

आप थे ख़ामोश जब हुई पेशगी अपनी वहाँ,,

कुछ इस तरह की बात थी, हम माज़रा समझ गए।

 

पैर उतना ही पसारा ,जितनी मिली चादर हमें, 

हम तो दरिया थे नहीं, तो दायरा समझ गए।

 

हर नज़्म तो बस दाद के खातिर नहीं लिखी कभी, 

पर आप ही इसको महज़, मुशायरा समझ गए।

 

कुछ देर के खातिर हम दूजी कलम लेने गए, 

"नील" को तो आप आख़िर लापता समझ गए।

Saturday, September 5, 2026

बस एक मुलाक़ात

इसको महज़ बात न समझो, 

बस एक मुलाक़ात न समझो।

 

ढल जाता है सूरज भी रोज़-रोज़, 

इसको कभी भी मात न समझो।

 

हो जाएगा रोशन हर पन्ना, 

बस कोरा एक दवात न समझो।

 

करते हैं रब से ही गुज़ारिश, 

नज़्म को सवालात मत समझो।

 

शोहरत और ये शहर की महफ़िलें, 

बस इनको ही कायनात मत समझो।

 

देता है पेड़ सबको अपनी छाँव, 

इसको तो तुम ख़ैरात मत समझो।

 

शायर की मुश्किलें बहुत हैं "नील",

रंगीन ख़यालात मत समझो।

पहचान

 

खोये कहाँ हैं, अब किधर पहचान है बाक़ी, 

उखड़ी सी हैं साँसें, मगर अरमान है बाक़ी।

 

काग़ज़ है अपना मन्दिर, और कलम मेरा ख़ुदा, 

बस थाम लूँगा उसको, ईमान है बाक़ी।

 

हर रक़्स में वही हैं, धुन में वही बसा, 

जो वो है तो हम में भी, इंसान है बाक़ी।

 

हैं नज़्म, गीत और कुछ अशआर के मुरीद, 

अभी "नील" का  पूरा इक दीवान है बाक़ी।

दायरा

हम जो चुप रहे तो फिर हमारी खता समझ गए,  हम बहुत ज़ल्द ,इधर का, कायदा समझ गए।   आप थे ख़ामोश जब हुई पेशगी अपनी वहाँ,, कुछ इस तरह की बात थी, हम...