कविता, नज्म, गजल
संचित किए ही जाते हैं, कोई सींचता नहीं इस धरा पे क्यों मानव का मन रीझता नहीं क्यों रव्वैये आज भी उसके पुराने हैं, शायद वो पत्थर की लकीरे...