कविता, नज्म, गजल
कब तक ये झूठी सी अना रखोगे कभी तो पस-ए-आईना रखोगे !! वो पूछते हैं क्यों फ़ना रखोगे तो, ईश को कब तक मना रखोगे ? कैसे होगी जीत बाज़ी की...