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नदियों का विस्तार तो देख
सागर से मिलने से पहले नदियों का विस्तार तो देख, मिट जाने से पहले अपने होने का आधार तो देख कुदरत है आँखों के आगे, कुदरत है मन के भीतर भूल ...
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उसके गीतों के ज्वाला ने लोहा तक पिघलाया था सोये भारत मन में भी एक नवसंचार जगाया था उसके कलम में वीरों के शहादत का प्रतिशोध था भारत माता...
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सागर से मिलने से पहले नदियों का विस्तार तो देख, मिट जाने से पहले अपने होने का आधार तो देख कुदरत है आँखों के आगे, कुदरत है मन के भीतर भूल ...
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नाज़ुक है दिल सँभाल कर रखिये, ना मोम सा इसे ढाल कर रखिये किन्हीं एहसासों का नाम है ग़ज़ल, उन एहसासों को सँभाल कर रखिये ये ग़ज़ल नहीं रहेगी ...
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (28-02-2018) को ) "होली के ये रंग" (चर्चा अंक-2895) पर भी होगी।
ReplyDelete--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
राधा तिवारी
dhanyvaad aapka
Deleteवाह वाह बहोत खूब
ReplyDeleteभई मजा आ गया पढ़ कर
आज मुझे एक बढ़िया ब्लॉग की खोज थी वो पूर्ण हुई
चर्चा मंच से आपका लिंक मिला मुझे और अब फॉलो भी कर रहा हूँ।
dhanyvaad ji
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