Thursday, May 5, 2011

दिनकर

उसके गीतों के ज्वाला ने लोहा तक पिघलाया था 
सोये भारत मन में भी एक नवसंचार जगाया था  
उसके कलम में वीरों के शहादत  का प्रतिशोध था 
भारत माता के दुश्मन को थर्राने का क्रोध था 

आंच तिरंगे की रखने को उनके शब्द बेताब थे 
गिरिवन के सिंहों के जैसे करते वो सिंहनाद थे 
हिंदी-साहित्य   का वो एक अमूल्य वरदान था 
क्रान्ति का अग्रदूत और भारत का  शान था 

उसने बिन बोले ही तब जवानों  को हर्षाया था 
उनके धमनियों  में  एक  सैलाब  सा  लाया  था 
माथे पर कोई सिकन नहीं कदमो में तब जान थे 
उसके लेखन में बस  क्रान्ति  के फरमान थे 

उनके सानिध्य में सोना कुंदन बन जाता था 
हर पन्ना उनका तब बलिदानी गीत गाता था 
बिन कटार के ही वो कलम का सिपाही था 
क्रान्ति के पथ पर वो निर्भय एक राही था 

उसके गीतों से संप्रभुता के स्वर निकलते थे 
गद्दारों के अरमानो पर बादल   बन बरसते थे 
वो इस  हिंद देश के कवियों का स्वाभिमान था 
शब्दों के उस मंदिर का "दिनकर" ही नाम था 


...










2 comments:

  1. kavi dinker ke liye yah samman prashansniy hai ...unki kavita oj se bhari hoti hai , kuch kar gujar jane si

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  2. वाह..दिनकर जी की प्रशंसा में जितना कहा जाए वो कम है..
    बहुत सुन्दर रूप से चित्रित किया आप ने दिनकर को..

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...