बहला रहे हैं सब यहाँ, अब कौन है अपना
कहने को हैं सदाएँ संग, बस मौन है अपना
उनकी निगाहों में ही कोई और दृष्टि है,
या सत्य में अविरल ये कौशल गौण है अपना
कब तक ये झूठी सी अना रखोगे कभी तो पस-ए-आईना रखोगे !! वो पूछते हैं क्यों फ़ना रखोगे तो, ईश को कब तक मना रखोगे ? कैसे होगी जीत बाज़ी की...
सुंदर
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ReplyDeleteसच है
ReplyDeleteआप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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