कविता, नज्म, गजल
बहला रहे हैं सब यहाँ, अब कौन है अपना
कहने को हैं सदाएँ संग, बस मौन है अपना
उनकी निगाहों में ही कोई और दृष्टि है,
या सत्य में अविरल ये कौशल गौण है अपना
संचित किए ही जाते हैं, कोई सींचता नहीं इस धरा पे क्यों मानव का मन रीझता नहीं क्यों रव्वैये आज भी उसके पुराने हैं, शायद वो पत्थर की लकीरे...
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