कविता, नज्म, गजल
बहला रहे हैं सब यहाँ, अब कौन है अपना
कहने को हैं सदाएँ संग, बस मौन है अपना
उनकी निगाहों में ही कोई और दृष्टि है,
या सत्य में अविरल ये कौशल गौण है अपना
सुंदर
This comment has been removed by the author.
सच है
आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद
बहुत सुंदर
कब तक ये झूठी सी अना रखोगे कभी तो पस-ए-आईना रखोगे !! वो पूछते हैं क्यों फ़ना रखोगे तो, ईश को कब तक मना रखोगे ? कैसे होगी जीत बाज़ी की...
सुंदर
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteसच है
ReplyDeleteआप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDelete