Sunday, September 6, 2026

दायरा

हम जो चुप रहे तो फिर हमारी खता समझ गए, 

हम बहुत ज़ल्द ,इधर का, कायदा समझ गए।

 

आप थे ख़ामोश जब हुई पेशगी अपनी वहाँ,,

कुछ इस तरह की बात थी, हम माज़रा समझ गए।

 

पैर उतना ही पसारा ,जितनी मिली चादर हमें, 

हम तो दरिया थे नहीं, तो दायरा समझ गए।

 

हर नज़्म तो बस दाद के खातिर नहीं लिखी कभी, 

पर आप ही इसको महज़, मुशायरा समझ गए।

 

कुछ देर के खातिर हम दूजी कलम लेने गए, 

"नील" को तो आप आख़िर लापता समझ गए।

No comments:

Post a Comment

दायरा

हम जो चुप रहे तो फिर हमारी खता समझ गए,  हम बहुत ज़ल्द ,इधर का, कायदा समझ गए।   आप थे ख़ामोश जब हुई पेशगी अपनी वहाँ,, कुछ इस तरह की बात थी, हम...