Saturday, September 5, 2026

पहचान

 

खोये कहाँ हैं, अब किधर पहचान है बाक़ी, 

उखड़ी सी हैं साँसें, मगर अरमान है बाक़ी।

 

काग़ज़ है अपना मन्दिर, और कलम मेरा ख़ुदा, 

बस थाम लूँगा उसको, ईमान है बाक़ी।

 

हर रक़्स में वही हैं, धुन में वही बसा, 

जो वो है तो हम में भी, इंसान है बाक़ी।

 

हैं नज़्म, गीत और कुछ अशआर के मुरीद, 

अभी "नील" का  पूरा इक दीवान है बाक़ी।

4 comments:

अना

  कब तक ये झूठी सी अना रखोगे कभी तो पस-ए-आईना रखोगे !!   वो पूछते हैं क्यों फ़ना रखोगे तो, ईश को कब तक मना रखोगे ?   कैसे होगी जीत बाज़ी की...