हम जो चुप रहे तो फिर हमारी खता समझ गए,
हम बहुत ज़ल्द ,इधर का, कायदा समझ गए।
आप थे ख़ामोश जब हुई पेशगी अपनी वहाँ,,
कुछ इस तरह की बात थी, हम माज़रा समझ गए।
पैर उतना ही पसारा ,जितनी मिली चादर हमें,
हम तो दरिया थे नहीं, तो दायरा समझ गए।
हर नज़्म तो बस दाद के खातिर नहीं लिखी कभी,
पर आप ही इसको महज़, मुशायरा समझ गए।
कुछ देर के खातिर हम दूजी कलम लेने गए,
"नील" को तो आप आख़िर लापता समझ गए।
वाह्ह लाज़वाब गज़ल है सर।
ReplyDeleteआपकी यह रचना सीधे दिल को छूती है क्योंकि इसमें निहित भाव
आम ज़िंदगी के अनुभवों और समाज की बनावटी मानसिकता को उघाड़कर रख देती है।
सादर।
-----
नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ८ सितम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
धन्यवाद आपका
ReplyDelete