किया जो फर्ज था पर, इनाम उसमे ढूंढेंगे
धूप लाजिम है, नसीम-ए-शाम उसमे ढूंढेंगे
जो डायरी लिखोगे, अपना नाम उसमे ढूंढेंगे
हम तो शायर हैं ,बस कलाम उसमे ढूंढेंगे
बहुत शिद्दत से निभाया है उसने रिश्ता,
ऐब कुछ लोग ,सर-ए-आम उसमे ढूंढेंगे
मदद ही कर रहे थे, कमी कहाँ निकाली
नहीं मालूम था वो इल्जाम उसमे ढूंढेंगे
नफे की बात न कर, है रब का घर साहब
आप अपना काम ढूंढें, हम राम उसमे ढूंढेंगे
अगर सागर में ही ढूंढना है "नील" मोती को,
भले हो जाएँ हम नाकाम, उसमे ढूंढेंगे
वाह्ह बहुत बढ़िया।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १८ सितंबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
वाह!बहुत खूब!
ReplyDeleteआपका बहुत-बहुत धन्यवाद
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