Saturday, September 26, 2026

शायद वो पत्थर की लकीरें खींचता नहीं

संचित किए ही जाते हैं, कोई सींचता नहीं 

इस धरा पे क्यों मानव का मन रीझता नहीं

 

क्यों रव्वैये आज भी उसके पुराने हैं, 

शायद वो पत्थर की लकीरें खींचता नहीं

 

है उसको ये गुमान कि उसमें आ गयी हुनर, 

मेरी हार से लेकिन वो कुछ भी सीखता नहीं

 

मेरे सामने कोई नज़्म को कहना नहीं बुरा 

मानव नहीं हैं, शब्द हैं, कोई नीचता नहीं

 

आते हैं सब को तौर तरीके बहुत से "नील" 

देखी है अब तक किसी में दृढ़ता नहीं

5 comments:

  1. बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना।
    सादर।
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    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २९ सितम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. कभी हमारे पेज पे भी पधारिए 🙏

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  3. आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद

    ReplyDelete

शायद वो पत्थर की लकीरें खींचता नहीं

संचित किए ही जाते हैं, कोई सींचता नहीं  इस धरा पे क्यों मानव का मन रीझता नहीं   क्यों रव्वैये आज भी उसके पुराने हैं,  शायद वो पत्थर की लकीरे...