Saturday, April 23, 2011

उन पन्नों के सानिध्य में



हर पन्ने कहाँ कुछ बोलते हैं 
किसी के मन को कहाँ वो टटोलते हैं 

तेरे लिखे को किसी  योग्य पुस्तक  
के ह्रदय में  स्थान  तो मिल जाता है 

पर तेरे लेखनी को सार्थकता कहाँ 
वो देते हैं 

तेरे  पन्ने के साथ वाले पन्ने 
अगर किसी स्नेहयुक्त स्याही
से रचित किये गए हैं 
तो उन   पन्ने को  सदा स्थान मिलता है
उस पुस्तक के ह्रदय में 
पर इस मर्म को कौन समझते हैं 


उन पन्नों के सानिध्य में वो
अनजाना पन्ना भी एक दिन 
पुस्तक में परिवर्तित हो जाता है 


और पन्नो को समेटने का 
कर्त्तव्य निभाता जाता है 
एक जौहरी के जैसा 

और पन्ने से पन्ने तब  रोज़ सीखते हैं 

6 comments:

  1. Beautiful lines !...Very meaningful and appealing.

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  2. तेरे पन्ने के साथ वाले पन्ने
    अगर किसी स्नेहयुक्त स्याही
    से रचित किये गए हैं
    तो उन पन्ने को सदा स्थान मिलता है
    उस पुस्तक के ह्रदय में
    पर इस मर्म को कौन समझते हैं
    marm ! ... samajhker koi samajhna nahi chaahta

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  3. खुबसुरत रचना के लिए बधाई के पात्र है। धन्यवाद।

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  4. बहुत सुंदर भाव
    आशा

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  5. mast hai re...yeh samajh main ayi

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  6. :)thanx ashu...
    i will keep my poem for you all ,once i get a job..

    thanx asha ji,zeal ji,ehsaas ji ,rashmi ji

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