Sunday, September 6, 2026

दायरा

हम जो चुप रहे तो फिर हमारी खता समझ गए, 

हम बहुत ज़ल्द ,इधर का, कायदा समझ गए।

 

आप थे ख़ामोश जब हुई पेशगी अपनी वहाँ,,

कुछ इस तरह की बात थी, हम माज़रा समझ गए।

 

पैर उतना ही पसारा ,जितनी मिली चादर हमें, 

हम तो दरिया थे नहीं, तो दायरा समझ गए।

 

हर नज़्म तो बस दाद के खातिर नहीं लिखी कभी, 

पर आप ही इसको महज़, मुशायरा समझ गए।

 

कुछ देर के खातिर हम दूजी कलम लेने गए, 

"नील" को तो आप आख़िर लापता समझ गए।

5 comments:

  1. वाह्ह लाज़वाब गज़ल है सर।
    आपकी यह रचना सीधे दिल को छूती है क्योंकि इसमें निहित भाव
    आम ज़िंदगी के अनुभवों और समाज की बनावटी मानसिकता को उघाड़कर रख देती है।
    सादर।
    -----
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ८ सितम्बर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. धन्यवाद आपका

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  3. वाह!!!
    बहुत ही लाजवाब गजल ।

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  4. धन्यवाद आप सभी का

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